Tuesday, July 31, 2012


     भगवान दास जी का निधन एक बड़ी छति है.---------कवंल भारती, रामपुर.
                                                   साभार- सच्ची-मुच्ची, मई,२०११.
 भगवान दास जी दलित साहित्‍य के सबसे बडे लेखक थे, पर भारत की मीडिया ने जिस तरह उनकी उपेक्षा की, उससे साबित होता है कि हमारा प्रचार तंत्र अपनी जातिवादी मानसिकता से अभी मुक्‍त नहीं हो सकता है। आज तीन दिन बाद भी किसी अखबार और समाचार चैनल ने उनकी मृत्‍यु का समाचार नहीं दिया।
      मैं भगवान दास जी के सम्‍पर्क में लेखक के रूप में स्‍थापित हो जाने के बाद ही आया था। पर, उनके साहित्‍य के सम्‍पर्क में 1970 के आस-पास अपने छात्र जीवन में ही आ गया था। उन दिनों हमारे शहर में आंबेडकर मिशन की नयी-नयी शुरूआत हुई थी। उससे पहले हमारे शहर में कोई जानता भी नहीं था कि कौन आंबेडकर और कैसी जय भीम। जो लोग इस मिशन का काम कर रहे थे, वे चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पुस्‍तक बाबासाहेब का जीवन-संघर्ष और नकोदर रोड, जालंधर से निकलने वाली लाहौरी राम बाली की भीम पत्रिका का वितरण करते थे। भीम पत्रिका में ही मैंने पहली दफा भगवान दास जी का नाम देखा और उनके लेख पढे। यह काफी बाद में पता चला कि भीम पत्रिका निकालने की प्रेरणा बाली साहब को भगवान दास जी से ही मिली थी और उसकी शुरूआत उर्दू में हुई थी। उर्दू अंकों की एक फाइल मैंने दारापुरी जी के यहॉं देखी थी। यह भी उन्‍हीं से पता चला कि जिस मैं भंगी हूँ पुस्‍तक से भगवान दास जी विख्‍यात हुए उसका धारावाहिक प्रकाशन उर्दू भीम पत्रिका में ही हुआ था।
      1973 में,नयी दिल्‍ली के रामलीला मैदान में एक विशाल ऐतिहासिक दीक्षा समारोह हुआ था, जिसमें तिब्‍बत के दलाईलामा के द्वारा भारत के दलितों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गयी थी। मैंने भी उस दीक्षा-समारोह में भाग लिया था। वहां किताबों के स्‍टाल भी लगे थे, जहां से मैंने भगवान दास जी की एक पुस्‍तक दस स्‍पोक आंबेडकर खरीदी थी, जो उस श्रृंखला का पहला वाल्‍यूम था। वह क्राउन आकार में था और उसके कवर का रंग लाल था। वह पुस्‍तक 1984 तक मेरे पास रही। उस वर्ष मैं लालगंज अझारा, प्रतापगढ में तैनात था, जहॉं मेरे साथ एक ऐसा हादसा हुआ  कि मुझे अपनी बहुत सारी पुस्‍तकों और अन्‍य सामान को वहीं छोडकर आना पडा। उन्‍हीं में भगवान दास जी वह पुस्‍तक भी छूट गयी थी।
      मेरी कमजोरी है कि मैं डायरी नहीं लिखता। इसलिये किससे कब भेंट हुई, इसकी कोई प्रामणिक जानकारी मेरे पास नहीं रहती। भगवान दास जी से पहली दफा सम्‍भवत: दिल्‍ली में उनके निवास पर ही मैं मिला था।कानपुर के जिस कार्यक्रम में भगवान दास जी और मैं साथ-साथ थे, उसे के.नाथ ने आयोजित किया था। उसकी तारीख मैंने के.नाथ से पता की। वह दलित साहित्‍यकार सम्‍मेलन था, जो 10 नवम्‍बर,1999 को आयोजित हुआ था। कानपुर में मैं और भगवान दास जी जैंडिस क्‍लब में एक ही कमरे मे ठहराये गये थे। वहॉं उनके साथ कुछ समय गुजारना मेरे लिये गौरव की बात थी। दलित साहित्‍य और राजनीति के बहुत से मुद्दों पर मुझे उनसे बातचीत करने का मौका मिला था। हमारी बातचीत का मुख्‍य विषय भारत में समाजवाद की जरूरत से शुरू हुआ था और कांशीराम-मायावती की राजनीति पर खत्‍म हुआ था।
      मेरी और भगवान दास जी की खानपान की रूचियॉं कुछ अलग थी, यह मैं जानता था। इसलिये, रात का भोजन लेने से पहले का कार्यक्रम उनके सामने नहीं किया जा सकता था। अत: मैं अभी आया कहकर भगवान दास जी को कमरे में छोड,नीचे उतरा और बार में जाकर बैठ गया। बार क्‍लब के सदस्‍यों के लिये था, पर मुझसे बैरे ने कुछ नहीं पूछा और जो मैंने मॉंगा, उसने सर्व कर दिया। बार से निपटकर मैं ऊपर गया।भगवान दास जी से खाने पर चलने के लिये कहा। खाने की व्‍यवस्‍था भी नीचे थी, यह मैं देख आया था। हम दोनों डायनिंग रूम में गये। मैं दाल, सब्‍जी और रोटी का आर्डर देने ही वाला था कि भगवान दास जी बोले, मैं सिर्फ चावल लूँगा, रोटी नहीं। उन्‍हांने बताया, जब से पेसमेकर लगा है, मैं चावल ही लेता हूँ। मुझे उस दिन पता चला कि वे हार्ट के वे मरीज थे और उनकी बाईपास सर्जरी हुई थी। वे सचमुच बहुत साहसी और जीवट के व्‍यक्ति थे, जो इस बीमारी में भी यात्रा कर रहे थे और काम कर रहे थे।
      कानपुर मं एक दिन के साथ ने मुझे भगवान दास जी को ठीक-ठाक समझने का अवसर दिया था इससे पहले उनकी जो छवि मेरे दिमाग में थी, वह एक ऐसे लेखक की थी, जो भारत में कम और विदेश में ज्‍यादा रहता है, जो एकला चलने में विश्‍वास करता है और विदेशों से ढेर सारा रूपया लाकर ठाठ से रहता है। उन्‍होंने किसी को अपने साये में आगे नहीं बढने दिया और किसी दलित को अपनी किसी योजना में शामिल नहीं किया। उस मुलाकात ने इस छवि को तोड दिया था। वे एकला चलते थे, इसमें तो सच्‍चाई थी, पर वे काफी सहज,सरल और विनम्र ह्रदय इन्‍सान थे और मार्ग-दर्शन करने में हमेशा तैयार रहते थे। अपने लेखन के दौरान कई दफा ऐसा हुआ कि मैं डा. आंबेडकर के संबंध में कुछ चीजों को लेकर कन्‍फ्यूज हो जाता था, तो समाधान के लिये मैं भगवान दास जी को ही फोन करता था, उन्‍होंने हमेशा मेरे भ्रम का निवारण किया और पूरी प्रामाणिकता के साथ मुझे सही जानकारी दी।  कभी भी यह महसूस नहीं किया कि वे मुझसे डिस्‍टर्ब हुए हैं या उन्‍हांने मुझे टालने की कोशिश की है। मैंने अपनी सन्‍त रैदास-एक विश्‍लेषणपुस्‍तक उन्‍हीं को समर्पित की थी। मैंने लिखा था-दलित साहित्‍य के इतिहास-पुरूष श्री भगवान दास को समर्पित। जब यह पुस्‍तक उन्‍हें मिली तो उनका ध्‍यान समर्पण पर नहीं गया और इधर-उधर से पुस्‍तक को देखकर उसे रख दिया। काफी दिनों बाद जब उनकी निगाह अचानक समर्पण पर गयी, तो उन्‍होंने मुझे फोन किया और धन्‍यवाद दिया।
      तीसरी भेंट भगवान दास जी से मैंने अपने शहर में ही की, जहॉं वे मेरे निमन्‍त्रण पर हमारे एक कार्यक्रम में आये थे। जब वे रामपुर आये, तो कार्यक्रम के बाद वाल्‍मीकि धर्म समाज के कुछ युवकों ने महर्षि वाल्‍मीकि को लेकर उनके विचारों का विरोध किया अैर उनसे बहस करनी चाही।पर, जब भगवान दास जी ने उन युवकों से बातचीत की, तो युवकों के पास उनके किसी सवाल का जवाब नहीं था।
      भगवान दास जी का जन्‍म 27 अप्रैल,1927 को जतोग कैंट शिमला में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा शिमला में ही हुई थी, और उच्‍च शिक्षा पंजाब और दिल्‍ली में। उन्‍हांने1968 में आंबेडकर मिशन सोसाइटी की स्‍थापना की थी, जिसकी शाखाऍं भारत के बाहर कनाडा, जर्मनी और इंग्‍लैण्‍ड में भी कायम हुई। कहा जाता है कि जब वे और एल.आर.वाली जिस देश में जाते थे, वहॉं आंबेडकर मिशन की शाखा खोलकर आते थे। वे दलित सालिडेरिटी पीपुल्‍स के संस्‍थापकों में थे। यह संस्‍था भारत, पाकिस्‍तान, बंगलादेश, नेपाल, जापान, श्रीलंका, मलेशिया और ऐशिया के अन्‍य देशोंमें विभिन्‍न धर्मों को मानने वाले अछूतों को जोडने के लिये बनायी गयी थी। यह उनकी विद्वता का ही प्रभाव था कि वे 1981में एशियन सेन्‍टर फार हयूमन राइट्स के निदेशक चुने गये थे। वे 1957 में भारतीय बौद्ध महासभा, 1964 में बौद्ध उपासक संघ और 1978 में समता सैनिक दल से जुडे थे। उन्‍हांने 1991 तक समता सैनिक दल के पुनरूत्‍थान के लिये काम किया। उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर एक परिचय,एक सन्‍देश समता सैनिक दल के कार्यकर्ताओं को बाबासाहेब के जीवन, और विचारों से परिचित कराने के लिये ही लिखी थी, जिसे समता सैनिक दल, नयी दिल्‍ली ने 1981 में प्रकाशित किया था।
      1981 में ही उनकी बहुचर्चित पुस्‍तक ‘’मैं भंगी हूँ’’ भीम पत्रिका कार्यालय,जालंधर से प्रकाशित हो गयी थी, जो अब दलित साहित्‍य में एक कालजयी कृति बन चुकी है। यह एक धारावाहिक लेख माला थी, जो भीम पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह पत्रिका आरम्‍भ में उर्दू में ही छपती थी, हिंदी में उसका प्रकाशन बाद में हुआ था। बाद में, भगवान दास जी के सम्‍पादन में इसके कुछ अंक दिल्‍ली से अंग्रेजी में भी छपे थे। जिस समय भगवान दास जी ने मैं भंगी हूँ लिखना शुरू की थी, मेहतर समाज पर कोई भी पुस्‍तक उपलब्‍ध नहीं थी। हालांकि रिचर्ड ग्रीव द्वारा दि चूहडा और एफ.फनिन्‍जार द्वारा दि भंगीज पुस्‍तकें लिखी जा चुकी थीं, परंतु वे उपलब्‍ध नहीं थीं। अत:एक तरह से भगवान दास की पुस्‍तक ही भंगी जाति पर हिन्‍दी में पहला काम था। यह भंगी जाति का सांस्‍कृतिक इतिहास था, जो उन्‍होंने लिखा था। हिन्‍दी में जब दलित लेखकों ने अपनी आत्‍मकथाऍं लिखना आरम्‍भ किया और आत्‍मकथा इतिहास की खोज का सिलसिला चला, तो मैं भंगी हूँ को पहली आत्‍मकथा का दर्जा मिल गया। बहुत से लोगों ने इसे भगवान दास जी की आत्‍मकथा समझ लिया, जबकि यह एक अछूत जाति की आत्‍मकथा है। पहली बार भगवान दास ने ही इस पुस्‍तक में भंगी समुदाय को वाल्‍मीकि नाम दिये जाने का खण्‍डन किया है।
      इसी विषय पर उनकी दूसरी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक बाबासाहेब भीमराव आंबडकर और भंगी जातियॉं है। बहुधा कुछ लोगों  द्वारा यह प्रचार किया जाता है कि बाबासाहेब ने जो कुछ किया वह या तो महारों के लिये किया या चमारों के लिये, मेहतर समुदाय के लिये उन्‍होंने कुछ नहीं किया था। भगवान दास जी ने इसी आरोप के खण्‍डन में इस पुस्‍तक को लिखा था। यह सचमुच पहली पुस्‍तक है, जिसमें उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया है कि किस तरह मेहतर समुदाय को डॉ. आंबेडकर के आन्‍दोलन से दूर रखने के मकसद से वाल्‍मीकि बनाया गया। यह पुस्‍तक बाबासाहेब और वाल्‍मीकि समुदाय कें संबंध में दुर्लभ सामग्री का स्‍त्रोंत ग्रन्‍थ है।
      भगवान दास जी मूलत:उर्दू और अंग्रेजी के लेखक थे। हिन्‍दी उन्‍हें ज्‍यादा नहीं आती थी। पर, हिन्‍दी के व्‍यापक क्षेत्र को देखते हुए ही उन्‍होंने हिन्‍दी में लेखन किया था। अंग्रेजी में उनका सबसे महत्‍वपूर्ण काम है- दस स्‍पोक आंबेडकर जो पॉंच खण्‍डों में है। डॉ. आंबेडकर की मूल रचनाओं के संकलन और सम्‍पादन का यह काम उन्‍होंने उस समय किया था, जब आज की तरह उनकी रचनाऍं आसानी से उपलब्‍ध नहीं थीं।
      भगवान दास जी ने जिस दौर में लेखन शुरू किया, वह मुख्‍यधारा के साहित्‍य से दलित साहित्‍य के संघर्ष का दौर था। यह वह दौर भी, था, जिसमें तथाकथित प्रगतिशील और धर्मवादी लेखक डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी को मार्क्‍सवाद-विरोधी बताकर दलित पाठकों को भ्रमित कर रहे थे। दलित लेखकों की ओर से भी इसका ठीक-ठीक प्रतिरोध नहीं हो पा रहा था, ऐसे समय में भगवान दास जी ही थे, जिन्‍होंने मार्क्‍सवाद,समाजवाद और मजदूर वर्ग के विषय में डॉ. आंबेडकर को सही परिप्रेक्ष्‍य में प्रस्‍तुत किया और दलित चिन्‍तन समाजवाद को किस अर्थ मे लेता है, इस पर प्रकाश डाला। इस दृष्टि से उनकी बाबासाहब भीमराव आंबेडकर एक परिचय, एक सन्‍देश पहली पुस्‍तक है, जिसमें वे यह बताते है कि  डॉ. आंबेडकर मार्क्‍स के विरोधी नहीं थे, बल्कि उसके समर्थक थे और उसके दर्शन को वे भारत के करोडों दलितों और गरीबों की मुक्ति का दर्शन मानते थे।
      भगवान दास जी का बहुत-सा साहित्‍य अप्रकाशित है। किसी समय उनकी कहानियॉं सरिता में छपा करती थीं। उन्‍होंने विश्‍व के लगभग एक दर्जन विश्‍वविद्यालयों, विश्‍वधर्म सभाओं और संगठनों में महत्‍वपूर्ण व्‍याख्‍यान दिये थे। ये सारे व्‍याख्‍यान और पेपर ही पॉंच सौ से ज्‍यादा हो सकते हैं। कुछ साल पहले उन्‍हांने वाल्‍मीकि पर एक बडी पुस्‍तक लिखने की योजना बनायी थी, जिसमें वे पाकिस्‍तान से एकत्र किये गये कुर्सीना मे भी संकलित करनेवाले थे। कह नहीं सकते कि इस योजना पर वे कितना काम कर गये थे? पर, मुझे लगता है कि स्‍वास्‍थ्‍य उनका साथ नहीं दे रहा था और वह उसे पूरा नहीं कर पाये थे। अब तो इस पुस्‍तक की पूरी रूपरेखा भी उनके साथ ही चली गयी।आज यदि उनकी कहानियों, अप्रकाशित लेखों और व्‍याख्‍यानों का ही संकलन कर दिया जाय, तो दलित साहित्‍य में यह एक बडा काम होगा। उनका जाना सचमुच एक आघात है। वे दलित साहित्‍य में बुनियाद के पत्‍थर थे। दलित साहित्‍य उनका हमेशा ऋणी रहेगा।  
आज 31 july 2012 ko शहीद आजम सरदार उधम सिंह का शहीदी दिवस है...(साभार भारत कोष )


       ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

    इतिहासकार वीरेंद्र शरण के अनुसार ऊधमसिंह इन सब घटनाओं से बहुत दु:खी तो थे, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताक़त बहुत बढ़ गई। उन्होंने शिक्षा ज़ारी रखने के साथ ही आज़ादी की लड़ाई में कूदने का भी मन बना लिया। उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए।
इतिहासकार डा. सर्वदानंदन के अनुसार ऊधम सिंह 'सर्व धर्म सम भाव' के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आज़ाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है।
स्वतंत्रता आंदोलन में भाग

      स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सन् 1919 का 13 अप्रैल का दिन आँसुओं में डूबा हुआ है, जब अंग्रेज़ों ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में सभा कर रहे निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलायीं और सैकड़ों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में माँओं के सीने से चिपके दुधमुँहे बच्चे, जीवन की संध्या बेला में देश की आज़ादी का सपना देख रहे बूढ़े और देश के लिए सर्वस्व लुटाए को तैयार युवा सभी थे।

        इस घटना ने ऊधमसिंह को हिलाकर रख दिया और उन्होंने अंग्रेज़ों से इसका बदला लेने की ठान ली। हिन्दू, मुस्लिम और सिख एकता की नींव रखने वाले 'ऊधम सिंह उर्फ राम मोहम्मद आज़ाद सिंह' ने इस घटना के लिए जनरल माइकल ओ डायर को ज़िम्मेदार माना जो उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था। गवर्नर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड, एडवर्ड हैरी डायर, जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग़ को चारों तरफ से घेर कर मशीनगन से गोलियाँ चलवाईं। इस के बाद घटना ऊधमसिंह ने शपथ ली कि वह माइकल ओ डायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए ऊधमसिंह ने अलग अलग नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्राएँ की। सन् 1934 में ऊधमसिंह लंदन गये और वहाँ 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार ख़रीदी और अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी ख़रीद ली।

प्रतिशोध

         भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए सही समय का इंतज़ार करने लगा। ऊधमसिंह को अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने का मौक़ा 1940 में मिला। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक थी जहाँ माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। ऊधमसिंह उस दिन समय से पहले ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। उन्होंने अपनी रिवाल्वर एक मोटी सी किताब में छिपा ली। उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में इस तरह से काट लिया, जिसमें डायर की जान लेने वाले हथियार को आसानी से छिपाया जा सके।

आत्मसमर्पण

      बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधमसिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। दो गोलियाँ डायर को लगीं, जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। गोलीबारी में डायर के दो अन्य साथी भी घायल हो गए। ऊधमसिंह ने वहाँ से भागने की कोशिश नहीं की और स्वयं को गिरफ़्तार करा दिया। उन पर मुक़दमा चला। अदालत में जब उनसे सवाल किया गया कि 'वह डायर के साथियों को भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया।' इस पर ऊधमसिंह ने उत्तर दिया कि, वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। अपने बयान में ऊधमसिंह ने कहा- 'मैंने डायर को मारा, क्योंकि वह इसी के लायक़ था। मैंने ब्रिटिश राज्य में अपने देशवासियों की दुर्दशा देखी है। मेरा कर्तव्य था कि मैं देश के लिए कुछ करूं। मुझे मरने का डर नहीं है। देश के लिए कुछ करके जवानी में मरना चाहिए।'

मृत्यु
    4 जून 1940 को ऊधमसिंह को डायर की हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें 'पेंटनविले जेल' में फाँसी दे दी गयी। इस प्रकार यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए थे। ऊधमसिंह की अस्थियाँ सम्मान सहित भारत लायी गईं। उनके गाँव में उनकी समाधि बनी हुई है।

Friday, March 16, 2012

आर्थिक गुलामी से सचेत रहने की है जरूरत–विभूति नारायण राय

हिंदी विवि में डॉ.आंबेडकर और भारतीय संविधान : वर्तमान में प्रासंगिकता पर हुआ वैचारिक विमर्श

वर्धा 10 दिसम्‍बर, 2011; आजादी आंदोलन के समय एक ऐसा नेतृत्‍व विकसित हो रहा था जो काफी अर्थों में आधुनिक व देशभक्‍त था। डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर कहते रहे कि राजनीतिक आजादी का कोई औचित्‍य नहीं जबत‍क कि हमें सामाजिक व आर्थिक आजादी न मिले। महात्‍मा फुले, डॉ.आंबेडकर को आशंका थी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी हम गुलामी में ही जियेंगे। असमानता व जातिवाद का मसला आज भी बरकरार है। हाल ही में एक रिपोर्ट आयी कि असमानता के मामले में भारत का स्‍थान प्रथम हो गया है। दुनिया के कई सारे मुल्‍क, जहां कि ह्यूमेन इंडीकेटर के ग्राफ हमसे कम हैं, दुर्भाग्‍य है कि वह भी असमानता के मामले में हमसे पीछे है। डॉ.आंबेडकर के चिंतन में समानता, बंधुत्‍व, अखंडता आदि शामिल हैं। कुछ ताकतें संविधान को गैर-जरूरी मानती हैं। दुनिया के सारे ग्रंथों से यह हमें अधिक पवित्र लगता है, क्‍योंकि इसमें समता, शोषणविहीन समाज रचना व मानवीय मूल्‍यों की बात समाहित है। आज हमें आर्थिक गुलामी से सचेत रहने की जरूरत है।

उक्‍त उदबोधन महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के कुलपति ने व्‍यक्‍त किए। वे डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर की 55 वें महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर और भारतीय संविधान : वर्तमान में प्रासंगिकता विषय पर आयोजित संगोष्‍ठी की अध्‍यक्षता करते हुए बोल रहे थे। हबीब तनवीर सभागार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान साहित्‍य विद्यापीठ के प्रो.के.के.सिंह, डॉ. आंबेडकर अध्‍ययन केंद्र के कार्यकारी निदेशक डॉ.एम.एल.कासारे बतौर वक्‍ता के रूप में मंचस्‍थ थे।

डॉ.एम.एल.कासारे बोले, बाबासाहेब ने अपने ज्ञान का उपयोग देश के नवनिर्माण में लगाया। उनका मानना था कि देश की सामाजिक व्‍यवस्‍था में जाति व्‍यवस्‍था ने भयंकर नुकसान पहुंचाया है। जाति व्‍यवस्‍था के कारण ही हम गुलाम हुए हैं। उनके विचारों को दुनिया मान रही है। अभी हाल ही में ऑक्‍सफोर्ड विवि ने एक पर्चा प्रकाशित किया है जिसमें पिछले दस हजार वर्षों में मानव समाज की सेवा करने वालों के सौ लोगों की सूची तैयार की है जिसमें भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, सम्राट अशोक के बाद डॉ. आंबेडकर को भी शामिल किया गया है। डॉ. कासारे ने कहा कि मणि भवन में बाबासाहेब ने गांधीजी से पूछा कि बापू आप किस देश की बात कह रहे हैं, जिस देश में हमें कुत्‍ते और बिल्‍ली से भी नीच समझा जाता है। यह असमानता आज भी बदस्‍तूर जारी है जिसकी खात्‍मा के लिए हमें निरंतर प्रयास करना चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान प्रो.के.के.सिंह ने कहा कि बाबासाहेब ऋग्‍वेद से लेकर तमाम ग्रंथों को पढ़ने के बाद भारत की जाति व्‍यवस्‍था की प‍हचान करते हैं। साम्राज्‍यवादी दौर में उन्‍होंने बताया कि भारत में जाति व्‍यवस्‍था का संबंध किसी नस्‍ल से नहीं है। दैवीय उत्‍पति भी नहीं है। उन्‍होंने नई अवधारणा दी कि यह अनुकरण पर आधारित है। डॉ. बाबासाहेब की रचना ऐल्‍हीलेशन ऑफ कास्‍ट को कम्‍यूनिस्‍ट घोषणापत्र माना जाना चाहिए, का जिक्र करते हुए प्रो.सिंह ने बताया कि इसमें बाबासाहेब ने भारत की जाति व्‍यवस्‍था का जिक्र किया है। उन्‍होंने इस देश के जाति व्‍यवस्‍था की अमानुषिकता को देखा। इतिहासकार मानते हैं कि जाति व्‍यवस्‍था समाज की लौह ढांचा है। गौतम बुद्ध सबसे पहले इस व्‍यवस्‍था पर करारी चोट करते हैं। बाबासाहेब जाति व्‍यवस्‍था को तोड़ने के लिए बुद्ध की ओर जाते हैं। उनका मानना था कि इस देश में मजिस्‍ट्रेट से ज्‍यादा डर पूरोहितों से है। कबीर भी तो पूरोहित और मौलवियों पर चोट करते हैं। क्‍योंकि ये सुलाने में विश्‍वास करते हैं। बड़े लोग जनता को जगाने में विश्‍वास करते हैं। बाबासाहेब ने कहा था कि जाति व्‍यवस्‍था हमारी मन:स्थिति बन गई और इसे पुरोहितों और मौलवियों ने मन में बिठा दिया है। क्‍योंकि इसे शास्‍त्र का आधार प्राप्‍त है। इसलिए बाबासाहेब प्रतीकात्‍मक रूप में मनुस्‍मृति का दहन करते हैं। प्रो. सिंह ने कहा कि जाति व्‍यवस्‍था तबतक बनी रहेगी जबतक आप शास्‍त्रों से संचालित होते रहेंगे। भारत का हिंदू समाज बहुमंजिली मिनार के रूप में दिखती है जिसमें प्रवेश करने के लिए न खिड़की है, न दरवाजा और न ही सीढ़ी। ऊंच-नीच बरकरार है। आज जैसे ही जाति व्‍यवस्‍था की बात की जाती है, छदम चेतना आने लगती है कि हम तो ऊपर हैं, हमारा नुकसान होगा, विरोध शुरू हो जाती है। प्रेमचंद के कर्मभूमि में वर्णित सामाजिक सुधार का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि तुम क्रांति की बात करो पूरा समाज सुनेगा पर जैसे ही तुम व्‍यवहार की धरातल पर बात करोगे विरोध शुरू हो जाएगा। हम सिद्धांत की बातें करते हैं पर व्‍यवहार में रूढि़वादी ही रहते हैं। आज जरूरत है कि बाबासाहेब के चिंतन को व्‍यवहार के धरातल पर उतारें।

दूरस्‍थ शिक्षा के संदीप सपकाले ने कहा कि समतामूलक समाज निर्माण के लिए इस दिवस को चिंतन दिवस के रूप में मनाना चाहिए। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्‍यार्पण कर कार्यक्रम की शुरूआत हुई। डॉ. भदन्‍त आनन्‍द कौसल्‍यायन बौद्ध अध्‍ययन केंद्र के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरजीत कुमार सिंह ने मंच का संचालन किया। बौद्ध अध्‍ययन केंद्र के रिसर्च एसोसिएट ज्‍येतिष पायें ने स्‍वागत वक्‍तव्‍य दिया। इस अवसर पर विवि के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे।

बांग्लादेश में दलित जीवन

बांग्लादेश में दलित जीवन

लेखक : नइमुल करीम , अनुवादक : आनन्द पाण्डेय

कल्पना कीजिये एक ऐसी जिंदगी की जिसमें किसी स्त्री-पुरुष को अपनी पहचान हर दिन समाज से खारिज हो जाने से बचने के लिए छुपानी पड़ती हो, जिसमें व्यक्ति को इंसान द्वारा निर्मित अतार्किक व्यवस्था की वजह से हर स्तर पर दण्डित होना पड़ता हो. इस तरह की नारकीय जिंदगी के लिए किसी दलित परिवार में पैदा हो जाना ही काफी है. सबसे खतरनाक तो यह है कि सरकार इस अमानवीय प्रथा की ओर आँखें बंद किये है.

बांग्लादेश में दलितों की आबादी लगभग १ करोड़ है. बांग्लादेश दलित परिषद् के अनुसार यह आबादी भारतीय उप महाद्वीप का सबसे उपेक्षित समुदाय है. बांग्लादेश दलित परिषद् के संयोजक विकास कुमार दास कहते हैं , “नेपाल और भारत जैसे देशों में ऐसे कानून हैं जो दलितों की भेदभाव से रक्षा करते हैं. ऐसे देशों में दलित उत्पीड़न के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. लेकिन, ४० सालों के बाद भी यहाँ कोई नियम नहीं है जो हमारी रक्षा कर सके. आज भी हमें अछूत माना जाता है.”

अनुसूचित जाति के नाम से भी जाना जाने वाला दलित समुदाय हिन्दू जाति-व्यवस्था की सबसे निचली जाति है. सदियों से यह जाति सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और अन्य विविध आधारों पर भेदभाव का शिकार रही है. जिसके फलस्वरूप सामान्य जनता से प्रतियोगिता करने के लिए इन्हें संघर्ष करना पड़ता है. इन्हें आज भी गटर सफाई, जूता पॉलिश, सफाई जैसे अपने परम्परागत पेशे में ही फंसे रहना पड़ता है. नाम-शूद्र से लेकर ऋषि तक कई दलित उपजातियां पूरे देश में पायी जाती हैं. फ़िर भी उन्हें भेदभाव से बचाने के लिए कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं की गयी है. यद्यपि कि संविधान जाति आधारित भेदभाव को निषिद्ध ठहराता है फ़िर भी दलितों का मानना है कि उन्हें सुरक्षात्मक हस्तक्षेप की आवश्यकता है. बांग्लादेश दलित परिषद् के सदस्य मिलन दास कहते हैं, “हम ऐसा कानून चाहते हैं जो खासतौर पर दलितों के उत्पीड़न को निषिद्ध करे. समाज में बेहतर जगह पाने के लिए हमारे लिए एकमात्र यही रास्ता है.”

अपनी निराशाजनक कहानी बयां करते हुए कुमार दास कहते हैं कि अपने परम्परागत पेशे छोड़कर मनमाफिक रोजगार करना और समाज की मुख्यधारा में जगह बनाना बहुत मुश्किल है. वह कहते हैं , “ छः महीने मेडिकल प्रैक्टिस के बाद मैंने दवा की दुकान खोलनी चाही. जब मैंने अपने सहकर्मियों से इस बात की चर्चा की तो उन लोगों ने सलाह दी कि यह घाटे का सौदा होगा क्योंकि एक दलित की दुकान से कोई भी दवा नहीं खरीदेगा.” दास ने उसी दिन अपनी नौकर छोड़ दी और फ़िर कभी लौट कर नहीं गए. उन्होंने बांग्लादेश दलित परिषद् के लिए काम शुरू कर दिया. बांग्लादेश दलित परिषद् दलितों की जिंदगी को बदलने की कोशिश करने वाले कुछ संगठनों में से एक है. दास कहते हैं, “नौकरियों की बात भूल जाइये, हमें तो साक्षात्कार के लिए भी नहीं बुलाया जाता क्योंकि हमारे नाम से ही हमारी पहचान का पता चल जाता है.” नौकरियों में आरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए दलित परिषद् कहती है कि सार्वजानिक क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्द्धा के कारण दलितों के लिए नौकरी पाना टेढ़ी खीर हो गया है. कुमार दास कहते हैं, “पूरे जीवन हम शिक्षा, और अन्य सामाजिक कारकों में पीछे रहे इसलिए सामान्य जनता के साथ प्रतियोगिता करना हमारे लिए संभव नहीं है.”

पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश हरिजन परिषद् और बांग्लादेश दलित परिषद् जैसे संगठनों के उभार हुए हैं. जिन्होंने दलितों में जागरूकता और संघर्ष की भावना का प्रसार किया है. विभिन्न संगोष्ठियों के माध्यम से वे सिविल सोसाइटी का समर्थन हासिल करने में कामयाब हुए हैं. यद्यपि कि कुछ प्रगति हुई है लेकिन समुदाय के नेताओं का मानना है कि और अधिक लाभ उठाने के लिए दलितों का संसद में प्रतिनिधित्व जरूरी है. कुमार दास कहते हैं , “किसी भी राजनीतिक दल में दलितों के प्रतिनिधि नहीं हैं. उपजिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक कोई भी दलित नहीं है. कोई भी हमारे बारे में नहीं सोचता है. इसलिए राजनीतिक रूप से हम बहिष्कृत हैं और यह एक बड़ी समस्या है.” दास और आगे कहते हैं कि अवामी लीग समेत कई दलों ने २००९ के चुनावी घोषणा-पत्र में दलितों के लिए कई वादे किये थे लेकिन आज तक सरकार ने कुछ भी नहीं किया है. दलित परिषद् के सदस्य राजनीतिक दलों को उन्हें महज वोट बैंक समझने का दोषी मानते हैं. एक हालिया सम्मलेन में दलित परिषद् के एक सदस्य ने कहा कि चुनाव परिणाम जो भी हों, विजयी दल अंत में दलितों की निंदा ही करता है. बांग्लादेश दलित परिषद् के सदस्य अशोक दास कहते हैं, “ सत्तारूढ़ दल ने हमारे लिए कभी भी कुछ नहीं किया है. हमारे संगठनों (बीडीपी-बीएचपी) को धन के लिए मानुषेर जन जैसे गैर सरकारी संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता है.

चुनाव से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए कुमार दास कहते हैं, “हाल में मेरे एक रिश्तेदार उपजिला चुनाव में खड़े हुए. नामांकन के बाद हम लोगों ने उनका समर्थन करना शुरू किया. पूरा सवर्ण समाज इसके खिलाफ था. उन्होंने घिनौने नारे लगाये और हमारे समुदायों को अपमानित किया. आखिरकार हमारे प्रत्याशी को चुनाव से अलग होना पड़ा.”

यद्यपि कि यह एक कठिन काम है फ़िर भी बीडीपी और बीएचपी का मानना है कि सरकार अंततः हमारी मांगों को मानेगी इसलिए इस दिशा में इन संगठनों ने कदम उठाना शुरू कर दिया है. उदाहरण के लिए राष्ट्रीय दलित आयोग के गठन की योजना इनमें से एक है. अशोक दास कहते हैं, “हमारा लक्ष्य है एक दलित आयोग का गठन जो हमें मुख्यधारा से जोड़ने और अन्य कई जरूरतों को पूरा करने में हमारी मदद करेगा.” वह कहते हैं, “अभी हमारा लक्ष्य है संगठित शक्ति होना.”

बीडीपी के अनुसार दलित महिलाओं के विरूद्ध अत्याचार एक अन्य प्रमुख समस्या है जिस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है. अशोक दास कहते हैं कि दलित महिलाएं दोहरे दमन का शिकार हैं. पहले तो औरत होने के नाते और दूसरे दलित होने के नाते. कुमार दास कहते हैं, “हमारे समुदाय की महिलाओं के लिए सवर्ण लोगों ने ‘मुचीर बो, शोबार शुन्दोरी भाभी’ जैसी कहावतें चला रखी हैं, जिसका अर्थ होता है कि दलित स्त्रियों को छेड़ने में कुछ भी बुरा नहीं है.”

अनारक्षण की नीति ने शिक्षा के क्षेत्र को भी प्रभावित किया हुआ है. दलित छात्रों को इसकी वजह से संस्थाओं में प्रवेश के लिए भटकना पड़ता है. बीडीपी से सम्बद्ध एक शिक्षाशास्त्री दावा करते हैं, “एससी छात्र हाई स्कूल में कम नम्बरों की वजह से विश्वविद्यालयों द्वारा खारिज कर दिए जाते हैं. सुविधाहीनता में ये इतने ही नम्बर ला सकते हैं.” इसके आलावा जिन छात्रों का सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रवेश हो भी जाता है वे अपनी पहचान छुपाते हैं ताकि किसी प्रकार की प्रतिक्रिया से बचे रह सकें.” सत्कारी राजकीय महाविद्यालय के छात्र बशुदेब दास बाबुल कहते हैं, “दलित छात्र अपनी पहचान नहीं उजागर करते हैं क्योंकि उन्हें अलग मेस में खाने या अलग होस्टल में रहने के लिए मजबूर किया जा सकता है.” वे आगे कहते हैं कि परिसरों में उन्हें समान अवसर नहीं मुहैया कराये जाते.

बाबुल उदाहरण के लिए, अपने बारे में बताते हैं, “मैं बांग्लादेश छात्र लीग का सक्रिय सदस्य हुआ करता था और प्रायः राजनीतिक भाषण भी देता था. लेकिन जब लोगों को पता चला कि मैं ऋषि हूँ, तो उन लोगों ने मेरी उपेक्षा करनी और मुझे खारिज करना शुरू कर दिया.” वह आगे कहते हैं कि मेरी जाति का पता चल जाने के बाद लोगों ने मुझे महाविद्यालय में महामंत्री बनने से रोक दिया. बहुत से अन्य दलित छात्रों की तरह बाबुल को भी जाति की वजह से नौकरियों के लिए मना कर दिया जाता था. फ़िलहाल वे बीडीपी को सहायता देने वाली परित्राण नामक गैर सरकारी संस्था में काम कर रहे हैं. बीडीपी के अन्य सदस्यों की तरह बाबुल भी मानते हैं कि सार्थक बदलाव के लिए दलितों को राजनीति में मौका चाहिए.

समान अवसर के तर्क के आधार पर विरोधी दलितों के लिए आरक्षण की नीति का विरोध करेंगे लेकिन उन्हें उस दर्द और अपमान को समझने की कोशिश करनी चाहिये जिससे वे सदियों से गुजर रहे हैं. यह असंभव है कि असमानता की जमीन पर खड़े होकर वे समाज में जगह बना पाएंगे. उम्मीद है, सत्ता में बैठे लोग आरक्षण के माध्यम से भारत में दलितों की उल्लेखनीय प्रगति से प्रेरित होंगे और देश के लगभग १ करोड़ दलितों को कुछ इसी तरह के कदम उठाकर देशवासी होने का अहसास दे पाएंगे.

नइमुल करीम बांग्लादेश के अग्रणी मीडिया समूह ‘द डेली स्टार’ के फीचर लेखक हैं. आनन्द पाण्डेय,पी.एचडी, राजनीतिक कार्यकर्त्ता, अनुवादक और लेखक हैं. यह लेख उक्त समूह की मासिक पत्रिका ‘फोरम’ के फरवरी अंक में छपा था. वहीं से लेकर इसका अनुवाद किया गया है.