Monday, May 25, 2020

संविधान, समाज और गांधी पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

THURSDAY, OCTOBER 4, 2018











    वर्धा, 3 अक्टूबर 2018 गांधी जयंती के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के गालिब सभागार मे संविधानसमाज और गांधी’ विषयक संगोष्ठी आयोजित हुई। संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो . गिरीश्वर मिश्र ने की। मुख्य वक्ता के बतौर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं संविधान विशेषज्ञ प्रो. एम. एल. कासारे मौजूद थे। संगोष्ठी का संचालन विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. सुरजीत कुमार सिंह ने की। सूत की माला पहनाकर स्वागत किया गया।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुये महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी सामाज कार्य अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. मनोज कुमार ने कहा की  संविधान समाज के लिए होता है। संविधान कितना लागू हो पाया, कितना समयानुकूल। समाज के विकास के लिए संविधान की भूमिका पर नए सिरे से विमर्श की जरूरत है। संविधान मे निरंतर सुविधा नुसार, संकुचिता किया जाता है। सत्ता आज निरंकुश हुआ है। लोकतन्त्र मे सत्याग्रह की भूमिका है। लोकतन्त्र आज कितना पारदर्शी हुआ है। ये सारे पहलू है जिस पर गहराई मे जा कर चिंतन करने की जरूरत है। लोकतंत्र मे असहमति के लिए भी समुचित स्थान होना चाहिए।
प्रो. नंदकिशोर आचार्य ने संगोष्ठी को संबोषित करते हुये कहा की, किसी भी  समाज मे संविधान की आवश्यकता क्यों होती है ? हजारों वर्षो पुराने समाज मे तरह तरह के मर्यादाएं रहती है। स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान वर्तमान भारत की रूप रेखा निर्मित हुई। गांधी संसदीय लोकतंत्र के पक्ष मे नही थे। संसद समस्याओं को बदलती रहती है, वह समस्याओं को निर्मूल नही करती । किन्तु तात्कालिक तौर पर गांधी संसदीय प्रणाली को  स्वीकार करते थे। सम्पूर्ण प्रभुसत्ता को एक जगह केन्द्रित कर देना गांधी की परंपरा नही थी। जब संविधान बना उसमे गांधी काही दिखाई नहीं देते। संविधान का बड़ा हिस्सा 1935 का अधिनियम है। भारतीय समाज मे परभुसत्ता केन्द्रित नही होती थी। चक्रवती सम्राट के दौर मे भी यही स्थिति थी। याज्ञवल्कय स्मृती के उदाहरण के जरिये भी उन्होने इसकी पुष्टि की। आधुनिक संदर्भ मे इसका अर्थ यह है की, एक विकेंद्रीकृत शासन  प्रणाली होनी चाहिए । गांधी ने इसी की बात की थी। विधायिका,न्यायपालिका एवं कार्य पालिका को भी विकेंद्रीकृत करने के पक्षधर थे । लोकतन्त्र मे प्रत्येक व्यक्ति का महत्व है । किन्तु लोकतंत्र जब केन्द्रित हो जाता है तो वह खतरनाक होता है। दुनिया का अनुभव बताता है की संसदीय लोकतंत्र तानाशाही स्थापित होने का खतरा बना रहता है। उन्होने कहा की भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों ने गांधी के पंचयाती राज की कल्पना को शामिल किया गया । किन्तु गांधी पंचायतों को पूर्ण स्वाययत्ता की बात कहे थे किन्तु वर्तमान पंचायत इससे भिन्न है। वर्तमान पंचायत राज्य के एजेंट की भूमिका मे है। लोकतंत्र वास्तविक अर्थ मे जनता की सहभागिता का नाम है।
              संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. एम. एल. कासारे ने अपने सम्बोधन मे कहा की, महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर के सम्बन्धों के बारे मे जानना आवश्यक है। डॉ. आंबेडकर ने गोलमेज़ सम्मेलन मे भारत की पूरी आज़ादी की मांग की थी। इसके बाद गांधी ने डॉ. आंबेडकर से मिलनेकी इच्छा व्यक्त की थी । डॉ. आंबेड़कर उनसे मिले थे। गांधी ने उन्हे महान देश भक्त बताया था। दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन के बाद गांधी और आंबेडकर के बीच पुना पेक्ट के बीच दूसरी मुलाक़ात हुई। 1936 मे सेवाग्राम आश्रम मे डॉ. आंबेड़कर  और गांधी के बीच आखरी मुलाक़ात हुई। डॉ. अंबेडकर ने इस मुलाक़ात मे गांधी जी से यह वादा किया था की उनका धर्म परिवर्तन से देश की एकता अखंडता को कोई नुकसान नही पाहुचेगा। 1935 के अधिनियम के निर्माण मे भी डॉ. अंबेडकर की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जब भारत का संविधान बनाने की बारी आयी तो नेहरू जी, प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ एडवर्ड जेनिंग को संविधान निर्माण की ज़िम्मेदारी देना चाहते थे। किन्तु गांधी ने नेहरू से डॉ. आंबेडकर को संविधान निर्मिति सभा अध्यक्ष बनने की बात की थी।  भारत मे जनतंत्र है , इसका सारा श्रेय भारत के संविधान को जाता है। भारत मे सामाजिक लोकतन्त्र का अभाव है। यहा का सामाजिक नियतिवाद सामाजिक लोकतन्त्र स्थापित करने की दिशा मे बाधक है। भारतीय संविधान मे न्याय, स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्वका मूल भाव निहित है। भारतीय संविधान ने जाती व्यवस्था पर गंभीर चोट किया है। भारतीय संविधान समाज व्यवस्था के रिपनतर का घोषणा पत्र है। आगे उन्होने कहा कि भारतीय एकात्मता अत्यंत ही कमजोर है। यहाँ स्तरीय असमानता  मौजूद है। जातिवाद और समप्रदयिकता जैसी चीजें यहाँ मौजूद है। भारत मे आज भी यह समस्याएँ है, जो बेहतर समाज बनाने की दिशा मे रोड़े अटकाती है। धर्म निरपेक्ष राज्य, धर्म निरपेक्ष समाज और धर्म निरपेक्ष संस्कृति विकसित करना होगा। सदियों पुराने मुल्य आज कलबाहय हो गए है, उसके जगह पर नए न्याय पूर्ण मुल्य अपनाने की जरूरत है।   अपने अध्यक्षीय वक्तव्य मे कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा की स्वतन्त्रता का अर्थ स्वछ्न्दता नही है। भारत के संविधान का पालन करना सभी नागरिकों का दायित्व है । संविधान के संशोधन की भी व्यवस्था हो, संविधान जड़ नही है। भारतीय संविधान गांधीजी के सर्वधर्म समभाव को फलीभूत करना है। गांधी अपने व्यवहार मे सर्वधर्म समभाव का अद्भुत ढ़ंग से पालन करते थे। ऐसे महान भारतीयों की परंपरा को ऐसे महान भारतीयों की परंपरा को हमलोग अपने जीवन मे उतारें। आभार ज्ञापन प्रो. मनोज कुमार ने किया ।

Sunday, May 24, 2020

अयोध्या को अब से 26 सौ वर्ष पहले बुद्धकालीन भारत में साकेत नगर के रूप में ख्याति

अयोध्या को अब से 26 सौ वर्ष पहले बुद्धकालीन भारत में साकेत नगर के रूप में ख्याति प्राप्त थी। तिपिटक सहित पालि गर्न्थो में साकेत का उल्लेख कहाँ कहाँ और कौन से सुत्तों में आया है, उसकी जानकारी इस प्रकार है। अगली पोस्ट में चीनी बौद्ध यात्रियों फ़ाहियान और ह्वेनसांग के हवाले से बात होगी।
Sāketa :
             A town in Kosala. It was regarded in the Buddha’s time as one of the six great cities of India, the others being Campā, Rājagaha, Sāvatthi, Kosambī, and Bārāṇasī (D.ii.146). It was probably the older capital of Kosala, and is mentioned as such in the Nandiyamigarāja Jātaka. J.iii.270; cf. Mtu.i.348, 349, 350, where it is called the capital of King Sujāta of the Sakyan race. See also the Kumbha Jātaka (J.ii.13), where Sāketa is mentioned as one of the places into which alcohol was introduced quite soon after its discovery by Sura and Varuṇa. According to the Mahānārada¬kassapa Jātaka (J.vi.228), it was the birthplace of Bījaka, aeons ago. In this context it is called Sāketa. According to a tradition, recorded in the Mahāvastu, Sāketa was the city from which Sakyan princes were exiled when they founded Kapilavatthu. E. J. Thomas accepts this view (op. cit., 16 f ).

           The Dhammapada Commentary (DhA.i.386), however, states that the city was founded in the Buddha’s time by Dhanañjaya, father of Visākhā, when, at the special invitation of Pasenadi, he went from Rājagaha to live in Kosala. On the way to Sāvatthi with Pasenadi, Dhanañjaya pitched his camp for the night, and learning from the king that the site of the camp was in Kosalan territory and seven leagues from Sāvatthi, Dhanañjaya obtained the king’s permission to found a city there. Because the site was first inhabited in the evening (sāyaṃ), the city came to be called Sāketa. The Divyāvadāna (211) has another explanation of the name, in connection with the coronation of Mandhātu (Svayaṃ āgataṃ svayaṃ āgataṃ Sāketa Sāketaṃ iti sañjnā samvrttā). The reference is probably to a new settlement established by Dhanañjaya in the old city.
       
              We also learn from the Visuddhimagga (p.390; but see below) that the distance from Sāketa to Sāvatthi was seven leagues (yojana), and there we are told that when the Buddha, at the invitation of Cūḷa Subhaddā, went from Sāvatthi to Sāketa, he resolved that the citizens of the two cities should be able to see each other. In the older books (e.g., Vin.i.253) however, the distance is given as six leagues. The town lay on the direct route between Sāvatthi and Patiṭṭhāna, and is mentioned (SN.vss.1011 1013) as the first stopping place out of Sāvatthi. The distance between the two places could be covered in one day, with seven relays of horses (M.i.149), but the books contain several references (e.g., Vin.i.88, 89, 270; iii.212; iv. 63, 120) to the dangers of the journey when undertaken on foot. The road was infested with robbers, and the king had to maintain soldiers to protect travellers.
       
             Midway between Sāketa and Sāvatthi was Toraṇavatthu, and it is said (S.iv.374 ff) that, when Pasenadi went from the capital to Sāketa, he spent a night in Toraṇavatthu, where be visited Khemā Therī who lived there. Between Sāketa and Sāvatthi was a broad river which could be crossed only by boat (Vin.iv.65, 228). Near Sāketa was the Añjanavana, where the Buddha sometimes stayed during his visits to Sāketa and where he had several discussions — e.g., with Kakudha (S.i.54), Mendasira (q.v.), and Kuṇḍaliya (S.v.73). See also Kāḷaka Sutta, Jarā Sutta, and Sāketa Sutta (S.v.219).

              On other occasions he stayed at the Kāḷakārāma (A.ii.24) gifted to the Order by Kāḷaka (q.v.), and the Tikaṇḍakīvana (A.iii.169), both of which were evidently near the city. Mention is also made (e.g., S.v.174, 298 f; for Sāriputta, see also Vin.i.289) of Sāriputta, Mahā-Moggallāna and Anuruddha staying together in Sāketa; Bhaddā-Kāpilānī (Vin.iv.292) also stayed there, so did Ānanda. Once when Ānanda was staying in the Migadāya in the Añjanavana, a nun, described as Jatiḷagāhikā (probably a follower of the Jatiḷā), visited him and questioned him regarding concentration. A.iv.427. Among others who lived in Sāketa were Jambugāmikaputta, Gavampati, Mendasira, Uttara, Madhuvāsettha and his son Mahānāga, and Visākhā. Bhūta Thera (q.v.) was born in a suburb of Sāketa.

           Buddhaghosa says (SNA.ii.532 f; cf. DhA.iii.317 f. and Sāketa Jātaka) that there lived at Sāketa a brahmin and his wife who, in five hundred lives, had been the parents of the Buddha. When the Buddha visited Sāketa they met him, and, owing to their fondness for him, came to be called Buddhapitā and Buddhamātā, their family being called Buddhakula.

             According to some accounts (e.g., AA.ii.482; but see Cūḷasubhaddā), Anāthapiṇḍika’s daughter, Cūḷa-Subhaddā, was married to the son of Kālaka, a millionaire (seṭṭhi) of Sāketa. Kāḷaka was a follower of the Nigaṇṭhā, but he allowed Subhaddā to invite the Buddha to a meal. She did this by scattering eight handfuls of jasmine-flowers into the air from her balcony. The Buddha read her thoughts, and went to Sāketa the next day with five hundred Arahants. At Sakka’s request, Vessavaṇa (Vissakamma?) provided gabled chambers in which the Buddha and his monks travelled by air to Sāketa. At the end of the meal, the Buddha taught Kāḷaka-seṭṭhi, who became a Stream-winner, and gave the Kāḷakārāma for the use of the monks.

                The Vinaya (Vin.i.270 f) mentions another millionaire of Sāketa. His wife had suffered for seven years from a disease of the head, and even skilled physicians failed to cure her. Jīvaka, on his way to Rājagaha, after finishing his studies in Takkasilā, visited Sāketa, heard of her illness, and offered to cure her. At first the millionaire was sceptical, but in the end allowed Jīvaka to attend on his wife. Jīvaka cured her by the administration of ghee through the nose, and, as reward, received sixteen thousand kahāpaṇas from her and her various kinsmen.

              Sāketa, is supposed to be identical with Ayojjhā (CAGI. 405), but as both cities are mentioned in the Buddha’s time, they are probably distinct. Rhys Davids thinks that possibly they adjoined each other “Like London and Westminster” (Bud. India, p.39. See also Sāketa Sutta, Sāketa Jātaka, Sāketapañha). The site of Sāketa has been identified with the ruins of Sujān Kot, on the Sai River, in the Unao district of the modern province of Oudh. The river referred to is probably the Sarayū, which flows into the Gharghara, a tributary of the Gaṅgā.

Sāketa Jātaka (No.68, 237) - 

1. Sāketa Jātaka (No.68).– Once, when the Buddha visited Sāketa, an old brahmin met him at the gate and fell at his feet, calling him his son, and took him home to see his “mother” the brahmin’s wife — and his “brothers and sisters” — the brahmin’s family. There the Buddha and his monks were entertained to a meal, at the end of which the Buddha taught the Jarā Sutta. Both the brahmin and his wife became Once-returners. When the Buddha returned to Añjanavana, the monks asked him what the brahmin had meant by calling him his son. The Buddha told them how the brahmin had been his father in five hundred successive past births, his uncle in a like number, and his grandfather in another five hundred. The brahmin’s wife had similarly been his mother, his aunt, and his grandmother. J.i.308 f; cf. DhA.iii.317 f; SNA.ii.532 f.
2. Sāketa Jātaka (No.237).– The story of the present is the same as in the above Jātaka. When the Buddha returned to the monastery he was asked how the brahmin had recognised him. He explained how, in those who have loved in previous lives, love springs afresh, like lotus in the pond. J.i.234 f

Sāketa Sutta.– The Buddha explains to the monks at Sāketa how to reckon the five controlling faculties (indriya) as the five powers (bala), and the five powers as the five controlling faculties. By developing them, release can be attained. S.v.219 f.
Sāketa Pañha.– The Aṭṭhasālinī (DhSA.267) mentions that the elder Tipiṭaka Mahādhammarakkhita, in talking of consciousness, once referred to the Sāketa Pañha. It is said that in Sāketa the monks raised the query, “When by one volition kamma is put forth, is there one conception only, or different conceptions?” Unable to decide, they consulted the elders well-versed in the Abhidhamma, who declared that just as from one mango only one sprout puts forth, so by one volition there is only one conception, and for different volitions, different conceptions.
Sāketa Tissa Thera.- He was not fond of learning, saying that he had no time for it. When asked by the others, “Have you time for death?” he left them and went to Kaṇikāravālikasamudda-vihāra. There, during the rainy season (vassa), he was very helpful to the monks, both young and old, and at the end of the rainy season on the full-moon day, he taught a discourse that greatly agitated his listeners. AA.i.44; cf. DA.iii.1061.
Sāketabrāhmana Vatthu.– The story of the brahmin of Sāketa who called himself the Buddha’s father. See the Sāketa Jātaka. DhA.iii.317 f.
Sāketaka.– An inhabitant of Sāketa. Mil.p.331.
Sāketa Sutta, Sāketapañha
Reference: Dictionary of Pāli Proper Names, Vol.II, (Editor) G. P. Malalasekera, first published in 1937, Pali Text Society, London and reprint in 2007, Delhi: Motilal Banarsidass, Page: 184-187.

Friday, January 11, 2019

डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन व्याख्यानमाला (पंचम) : 2019 का आयोजन

पालि भाषा एवं हिंदी का प्रचार-प्रसार ही कौसल्यायन जी के जीवन का उद्देश्य – प्रो. एम. एल. कासारे

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र के द्वारा डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन के 114 वें जन्मदिवस के अवसर पर प्रति वर्ष की भांति विशेष कार्यक्रम पाँचवाँ डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन व्याख्यान: 2019 का आयोजन किया गया।  
कार्यक्रम की शुरुआत बुद्ध वन्दना से हुई जिसमें भिक्षु राकेशानन्द जी के नेतृत्व में उपस्थित भिक्षु संघ ने त्रिशरण एवं पंचशील का पाठ, फिर भदंत आनंद जी के चित्र पर माल्यार्पण से हुई।
कार्यक्रम में आये हुए अतिथियों का स्वागत करते हुए केंद्र के प्रभारी निदेशक डॉ. सुरजीत कुमार सिंह ने कहा कि हम भगवान बुद्ध की मूल देशना को समझने का प्रयास करें, उन्होंने अपना पूरा जीवन समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए लगा दिया था, उन्होंने अपने पहले उपदेश में मानव को दुःख से दूर रहने हेतु उपाय के रूप चार आर्य सत्यों को बताया था, हमें इनके प्रति जागरूकता रखते हुए अपने सामर्थ्यानुसार संसार के समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री भावना का विकास करना चाहिए, हम सभी के मंगल की कामना करें, चाहें वह जल चर हों, नभ चर हों, थल चर हों, चाहें वह को वनस्पति ही क्यों न हों, हम सबके संरक्षण की बात करें, उनके कल्याण की भावना का प्रसार करें, किसी को कोई दुःख न दें, यही बौद्ध जीवन पद्धति है, यही बौद्ध जीवन का मार्ग है. तब सही अर्थों में हमारे द्वारा भदंत जी के लिए हमारी सच्ची आदरांजलि होगी।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आये हुए वरिष्ठ कवि आचार्य सूर्यकांत भगत ने भदंत जी के जीवनवृत्त पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन बुद्ध धम्म के लिए समर्पित रहा। भदंत जी सारनाथ में रह कर धर्मदूत पत्रिका का संपादन किये, नागपुर में दीक्षाभूमि पत्रिका के संपादन का भी कार्य देखा। वर्धा में वह राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के प्रधानमंत्री भी रहे, उनके वर्धा प्रवास के दौरान मुझे उनका सानिध्य प्राप्त हुआ, मैंने उनके लिए गौरव गीत लिखे और गए बौद्ध धम्म के प्रति तत्वज्ञान मुझे उनसे ही प्राप्त हुए। भदंत जी की अब तक कुल 80 किताबें प्रकाशित हुई, उन किताबों की प्रूफ रीडिंग करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त रहा। आचार्य सूर्यकांत भगत ने अपने लिखे गए गीत “बुद्धभूमि के नभ पर विपदा के बादल छाए, धम्मयान को आगे बढ़ने आनंद जी आगे आये” को गाकर भी सुनाया। उसके बाद विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी बी. एस. मिरगे ने कहा कि भदंत जी का वर्धा से जुडाव रहा है, पालि भाषा एवं बुद्ध धम्म के प्रति उनका कार्य अतुलनीय रहा है। डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित ग्रंथ ‘द बुद्धा एंड हिज धम्म’ का हिंदी अनुवाद कर आमजन के लिए बुद्ध धम्म पर एक उपयोगी ग्रन्थ उन्होंने दिया। 
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात अम्बेडकरी चिंतक एवं केंद्र के पूर्व संस्थापक निदेशक प्रो. एम. एल. कासारे ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि एक बार एक पत्रकार ने भदंत जी से पूछा कि आपके जीवन के क्या उद्देश्य हैं तो उन्होंने कहा कि मेरे जीवन के दो ही उद्देश्य हैं, एक हिंदी का प्रचार और दूसरा बौद्ध धर्म का प्रचार। उन्होने बुद्ध और उनका धम्म, बौद्ध धर्म का सार एवं पालि साहित्य के कई ग्रन्थों का अनुवाद किया। 31 दिनों मे पालि, भिक्षु के पत्र, यदि बाबा न होते इत्यादि पुस्तकों का लेखन भी किया। यदि हमे भदंत जी को समझना है तो उनकी किताबों को हमें पढ़ना होगा। उन्होंने अपनी बात को रखते हुए आगे कहा कि मैंने भदंत जी को कभी क्रोध करते हुए नहीं देखा, बच्चों के प्रति उनका प्रेम अगाध था। उन्हें देखकर मैंने समझा अकले प्रज्ञा से काम नहीं चलता, दुखी जनों को देखकर जो करुणा की भावना रखता है, वही बुद्ध शासन का सच्चा अनुयायी होता है। उन्होंने कहा कि धम्म ही सत्य है, सत्य ही धम्म है और यह गहन है, महासागर के समान है, आप सभी मेहनत के साथ धम्म का अध्ययन करें यही भदंत जी के प्रति आपकी सच्ची श्रध्दान्जलि होगी। 
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं विश्वविद्यालय के कार्यकारी कुलसचिव प्रो. कृष्ण कुमार सिंह ने आज हम लोग उत्तर आधुनिकता के दौर से गुजर रहे है, जहाँ स्मृतिहीनता सबसे बड़ी समस्या है, ऐसे समय में भदंत कौसल्यायन जी को स्मरण करने के लिए हम यहाँ उपस्थित हैं, यह हर्ष का विषय है। इसके लिए केंद्र के प्रभारी डॉ. सुरजीत कुमार सिंह बधाई के पात्र हैं। भदंत कौसल्यायन जी ने हिंदी की विचार परंपरा को समृद्ध करने का कार्य किया, जिसके लिए हम उनके ऋणी हैं, भदंत कौसल्यायन जी का जीवन एक सन्देश है, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, भदंत आनंद कौसल्यायन एवं आचार्य धर्मानंद कोसंबी के बौद्ध धर्म के विकास के प्रति किये गए योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वर्धा के लिए यह गौरव की बात है कि यहाँ भदंत आनंद कौसल्यायन एवं आचार्य धर्मानंद कोसंबी ने प्रवास किया। अब तक के ज्ञात इतिहास में यदि किसी महानतम व्यक्ति का नाम लिया जाये तो बुद्ध के सिवा कोई नहीं हो सकता, जिनके धम्म के मूल में करुणा, मुदिता एवं मैत्री है। हमे यदि बेहतर भविष्य का निर्माण करना है तो हमे बुद्ध धम्म का मार्ग अपनाना होगा एवं दुःख विमुक्ति में लिए अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण करना होगा।
कार्यक्रम का सफल एवं सुंदर संचालन केंद्र के सहायक प्रोफेसर डॉ. कृष्ण चंद पांडेय एवं धन्यवाद् ज्ञापन डॉ. शुभांगी शंभरकर ने करते हुए भदंत आनंद कौसल्यायन जी के जीवन के कई संस्मरण सुनाते हुए उनको याद किया। कार्यक्रम में रामभाऊ उमरे जी ने एक गीत सुनाया, दिनेश पटेल, रजनीश अंबेडकर, अमन ताक्सांदे, सुभाष कांबले, अनिकेत गायकवाड़, राजदीप राठौर, भंते इंद्रश्री, भंते आलोक, भंते मुदिता बोधि, अर्चना पाटिल, भाग्यश्री रामटेके, जीतेन्द्र कुमार, राहुल कुमार, नरेन्द्र, रामजी राव, राजेंद्र कुमार यादव, धम्मरतन, नीतू आनंद, मनोज कुमार, संजय कुमार, ओमप्रकाश बौद्ध व अन्य उपस्थित थे।

Saturday, June 10, 2017

कहीं से भी आ ओ मेरे बिरसा...




सब तेरी बाट जोहते हैं,
जिस दुष्कर राह पर तू चला
वह राजमार्ग बनकर बसा है
तुम्हारी यादों की तरह..
नंगी रातों में,
दहशत का साम्राज्य होते हुए भी
जैसे कि असंख्य तारों के बीच हो चांद..।
मैं जब कभी
आश्रमशाला में जाता हूं
बच्चे मुझसे पूछते हैं-
‘काका,बिरसा कहां रहते हैं ?’
तब मैं बच्चों की उस
निश्चल भाषा में
उत्तर न देकर
बन जाता हूं गुनहगार..।
बच्चे रोज रटते हैं
तेरे ही नाम की वर्णमाला
शायद तुम बतियाते होगे
बच्चों के सपनों में उतरकर
बताते होगे रहस्य..
पर वे तमाम लोग क्या करें
जो उन बच्चों की ही तरह
तुम्हारी राह देख रहे हैं ?...।
सबेरे-सबेरे चक्की चलाती हुई मां
गाती है तेरे ही गीत
मैं सुनता रहता हूं आंखे बंद किए..
पहाड़ों से उतरती औरतें
जो गीत तेरे गाती हैं
हमेशा लेती हैं कसम
तुम्हारे लिए
उन्हें भी लेता हूं मैं आंखों में उतार..।
लोग केवल गीत ही
नहीं गाते तेरे
वे सुनते हैं,
बोलते हैं..
मरते हैं-
घर,बाहर, पाठशाला,बाज़ार
मोर्चा और जंगल में
एक क्रांतिकारी बदलाव के लिए..।

सच में इनमें से किसी ने
तुमको नहीं देखा होगा
मैंने भी नहीं..
लेकिन केवल तुम ही हो
जो हमारे विद्रोह में
अकेले दिशा देते दिखाई देते हो..
उस समय तुझे जल्दबाजी हुई थी
गोरों को खदेड़ने की खातिर ?
सिंहभूमि,मंडला,वसई
चन्द्रपुर को करने को आज़ाद ?
बचाने के लिए हरे-भरे जंगल ?
आज ना गोरे हैं
न सपनों का साम्राज्य
ना घने जंगल हैं
ना तू है
है केवल जंगलों में फैलता असंतोष
और होठों पर तेरा नन्हा-सा गीत-
ऊलगुलान ! ऊलगुलान ! ऊलगुलान !
जो बन गया है
अब हमारा सांस्कृतिक आंदोलन..।
सच बताऊं, अब हमें जल्दी है
किंतु नहीं चाहते अब हम
ओढ़ी हुई सभ्यता
धिक्कारते हैं अन्धकार को
जंगल को बांटने वाली
दलाली प्रथा को
नकार है हमारा..।

गूंजती हैं घाटियों में पीछा करती आवाजें
बिरसा, तुम्हें कहीं से भी
कभी भीआना होगा..
घास काटती दरांती हो या
लकड़ी काटती कुल्हाड़ी
खेत-खलिहान की मजदूरी से
दिशा-दिशाओं से
गैलरी में लाए गए गोटुली रंग से
कारीगर की भट्टी से
यहां से वहां से
पूरब से
पश्चिम से
उत्तर से
दक्षिण से
कहीं से भी आ ओ मेरे बिरसा
खेतों का हरा-भरा बयार बनकर
लोग तेरी ही बाट जोहते हैं...।।।
---- भुजंग मेश्राम


(मराठी के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी आदिवासी कवि भुजंग मेश्राम की प्रसिद्ध कविता।)

Tuesday, September 13, 2016

केरल में महिलाओं को स्तन ढकने का अधिकार पाने का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा। इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था। नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला। इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं। यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें। लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी। सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे। आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं। इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया। मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया।

Thursday, July 30, 2015

याकूब मेमन की फांसी के बहाने देश के माई डियर मी लार्ड से गिला-शिकवा !!!

ओ मी लार्ड !!! मेरे माई डियर मी लार्ड !!! आपने याकूब मेमन को फांसी के लिए बहुत मेहनत की है. आपने बहुत ही कर्मठता का उदाहरण प्रस्तुत किया है. आपने देर रात में सोते उठकर आधी रात के बाद अपनी अदालत लगाई और आपने बहुत ही परिश्रम से अपने तीन न्यायाधीशों वाली पीठ को सुनवाई के लिए अदालत कक्ष अभूतपूर्व रूप से रात में खोला गया और अलसुबह 03 बजकर 20 मिनट पर शुरू हुई सुनवाई जो 90 मिनट तक चली. अर्थात सुबह 3:20 + 90 = 4: 50 बजे प्रात: तक। इस पीठ के अध्यक्ष जस्टिस दीपक मिश्रा जी ने सुप्रीम कोर्ट के कक्ष संख्या 04 में एक आदेश में कहा कि मौत के वारंट पर रोक लगाना न्याय का मजाक होगा और याचिका खारिज की जाती है। आपने अपनी नींद को खराब किया. मी लार्ड! क्या आप अगले दिन का इंतजार नहीं करवा सकते थे, केंद्र की भाजापानीत मोदी सरकार से और देश के माननीय गृहमंत्री ठाकुर राजनाथ सिंह जी से.? यह तो और भी अमानवीय है कि उसी दिन याकूब मेमन का जन्मदिन भी था. याकूब को आपने अपराधी बता दिया है, मैं उस बहस में पड़ना नहीं चाहता जो हमारे घाघ नेता, आपके लर्निड कंसोल रूपी तीक्ष्ण बुद्धीमत्ता वाले वकील, समाजिक कार्यकर्ता, टी.वी. वाले और वालियां चला रहे हैं. आपने रात में अपनी अदालत लगाई और फैसला सुनाया कि याकूब मेमन दोषी है, तो मैं आपके फैसले को सर-आखों पर रखता हूँ मी लार्ड! क्योंकि मैं कोई विधिवेत्ता नहीं हूँ, बल्कि एक साधारण आम-आदमी हूँ, जो साल का पचास हजार तो इन्कम टैक्स अपने वेतन से ही सरकार को देता हूँ. जिससे आपकी और हमारे नेताओं की तनख्वाह व अन्य भत्ते दिए जाते हैं. इसलिए मैं उन सब लोगों पर बहुत नजर रखता हूँ, जिनके घर के चूल्हे मेरे वेतन के मामूली अंश से चलते हैं.
माई डियर मी लार्ड आपको तो पता ही होगा कि हमारे देश की अदालतों में 03 करोड़ केस अपने फैसलों का इंतज़ार कर रहें हैं. यह तथ्यपरक बात रात में मुझे सपने में नहीं आयी और ना ही किसी ने मुझे रात में जगाकर बताया. बल्कि यह आपने खुद कहा है यह रहा सबूत जो मैं अंगरेजी में ही दे रहा हूँ ताकि आप जल्दी से समझ सकें कि यह आपने ही कहा है, वैसे मैं और मेरे जैसे करोड़ों भारतीय तो हिंदी ही पढ़ते और समझते हैं, यहाँ तक कि हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद मोदी जी भी. लेकिन मुझे पता है कि आपका कामकाज अंगरेजी में ही चलता है, तो आपको मैं भी हिन्दी में सबूत देकर और जगाना नहीं चाहता. तो मी लार्ड यह रहा आपका कहा: “More Than 3 Crore Court Cases Pending Across Country India (Press Trust of India | Updated: December 07, 2014 11:28) NEW DELHI:  Concerned over a backlog of more than three crore cases in courts across the country, Chief Justice of India HL Dattu has asked the Chief Justices of all High Courts to ensure expeditious disposal of cases pending for five years or more. A Supreme Court official said that the CJI has written a letter to all High Court Chief Justices asking them to look into the dockets of cases pending for five or more years in subordinate judiciary of all states. मी लार्ड! आप क्या इन तीन करोड़ केसों वाले भारतीय लोगों के लिए थोड़ा जग नहीं सकते ? मी लार्ड! क्या आप अपनी रात काली नहीं कर सकते, वैसे भी दिल्ली में रात के समय सड़कों के सोडियम बल्ब बहुत पीली रोशनी देते हैं, जो घने कुहासे में भी देखने के लिए सर्वोत्तम हैं. मी लार्ड! अब आप शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन छुट्टियों को अपनी अदालत में बंद कीजिये और खूब देर रात काम करिये व करवायें और फैसले सुनाईये ताकि तीन करोड़ केस और उससे जुड़े करोड़ों लोगों को न्याय मिल सकें. और हाँ! फैसले सुनाते समय आप मनुस्मृति का उद्धरण न दें, जिसको हमारे संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जलाया था, उद्धरण देने के लिए आपके पास हमारा भारतीय दण्ड संहिता का कोश ही काफी. मी लार्ड! मैं और भी बहुत कुछ कहना और लिखना चाहता हूँ आपके लिए. लेकिन यह उपयुक्त समय नहीं है, बस मैं यह कहूंगा कि आज भी बहुत सारे मामले ऐसे हैं, जहाँ आपको निष्पक्षता-संवेदनशीलता और न्यायप्रियता से देर रात तक काम करने की जरुरत है. बस आज मेरा मन उदास है..?


आपका                                                                                                  डॉ. सुरजीत कुमार सिंह
प्रभारी निदेशक व सहायक प्रोफेसर
डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केन्द्र
महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा.
ईमेल: surjeetdu@gmail.com दूरभाष: ०९३२६०५५२५६.      

(मेरे वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय के मित्र व शत्रु इसको न्यायालय की अवमानना न मानें और इसका चोरी छिपे प्रिंट लेकर न रखें व दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट भेजने के लिए अपने पैसे खर्च न करें. बल्कि मैं ही कल इस पत्र को रजिस्टर्ड पोस्ट करूंगा.)

Sunday, July 12, 2015

एक दिन असहाय पशु-पक्षियों के नाम... One day in Peoples for Animals, Wardha

मैं कल 11 जुलाई, 2015 को अपने पशु प्रेमी व मानव विज्ञानी मित्र डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव जी के साथ वर्धा में अपने विश्वविद्यालय के निकट पिपरी गाँव में स्थित Peoples for Animals, Wardha. जिसे करुणाश्रम भी कहते हैं. उसमें एक दिन उन बेजुबान असहाय, अपंग एवं निरीह जीव-जंतुओं के साथ बिताया. वैसे तो यह संस्था मेरे मित्र श्री आशीष गोस्वामी जी की है, वे मेनका गाँधी के संगठन Peoples for Animals से जुड़े हैं और उन्होंने अपना पूरा जीवन इन्हीं असहाय प्राणियों के नाम कर दिया है, वे मांस-मछली तो दूर की बात है अंडा भी नहीं खाते हैं, कहते हैं कि उसमें भी जीवन होता है. श्री आशीष गोस्वामी जी से परिचय एवं मित्रता करवाने का पूरा श्रेय हमारे परम प्रिय भगत सिंह रूपी मित्र डॉ. मोतीकपूर मानिकराव प्रफुल्ल मून जी को जाता है.
 

 


जब मैं और वीरेन्द्र भाई अपनी मोटरसाइकिल से वहाँ पहुंचे तो करुणाश्रम के गेट पर हमारा स्वागत वहाँ के प्रवासी असहाय कुत्तों ने किया. वे सब हम दोनों लोगों को देखने और मिलने ऐसे चले आ रहे थे, जैसे उनसे मिलने कोई उनका अपना आया हो. हम दोनों लोग तो उनके लिए अजनबी ही थे, क्योंकि वे पालतू कुत्ते थे जो उनके पालकों ने उन वेजुबानों को कई कारणों से घर से निकाल दिया था. उनकी पथराई और इंतजार करती बोझिल आँखों का हाल देखना मुश्किल हो रहा था. उनमें कोई बीमार था, किसी की कमर तोड़ दी गयी थी (यह घटना हमारे विश्वविद्यालय परिसर में एक कुत्ते के साथ हुयी थी, जिसको मैं और वीरेन्द्र भाई यहाँ लेकर इससे पहले आये थे), तो कोई सड़क से उठाकर लाया गया था. वे सब अपने आश्रय से निकाल दिए गये प्राणी थे, लेकिन उनको आश्रय तो मिला पर उनका मन तो अपनों पालकों को खोजता रहता है, नित्य-दिन-प्रतिदिन.
 

 

 

 
गेट से आगे बढ़ते ही दाहिने हाथ के पिंजरे में एक लंगूर का बच्चा बहुत जोर-जोर से चीखता और तड़फता दीखा, पास जाकर देखा तो उसकी किसी शिकारी द्वारा लगाये फंदे से पीछे वाली एक टांग कट गयी थी. वह हमको देखकर अपने हाथ की नन्ही-नन्ही उंगलियाँ पिंजरे से निकालकर चीं-चीं करता अपनी पीड़ा दिखा रहा था और खाने के लिए भी कुछ देने का अनुनय कर रहा था.
 


उसके पिंजरे के बराबर में ही पेड़ों से तीन ऊँट बंधे थे, जो बीमार थे और एक के चेहरे पर तो पीटने के खूनी निशान उभरे हुये थे. इन ऊँटों को वर्धा जिला अदालत ने एक मुकद्दमें के पूरा होने तक यहाँ रहने का आदेश सुनाया है, क्योंकि यह एक सर्कस के ऊँट हैं. यहाँ पर इसी अदालत ने सर्कस के एक बड़े पिंजरे में कई आष्ट्रेलियन तोते, जो वीरेन्द्र भाई जैसा बोल रहे थे वैसी ही नकल उतार रहा था और घोड़े भी केस के सिलसिले में बंद किये हैं. यह सब प्राणी अपने मालिक से कब तक दूर रहेंगे, इनका फैसला क्या होगा.? यह ना आशीष जी को पता है और ना ही वर्धा जिला अदालत के पास इतना समय है कि इनका केस जल्दी एक-दो दिन में निबटाये.
 

 

 

 

उसके आगे जो सबसे मार्मिक दृश्य था वह यह कि एक पिंजरे में एक छोटा सा लंगूर का बच्चा बहुत ही शांत-उदास-गंभीरता से बिना कोई हलचल किये बैठा था और जाली से अपनी नन्ही आखों से हमको देखने की कोशिश कर रहा था. पास जाकर देखा तो मन काँप उठा कि आखिर मनुष्य कितना क्रूर हो सकता है.? उसको बिजली का करंट लगा था, जो किसी ने अपने खेत की बाड़ की रखवाली के लिए तार में बिजली प्रवाहित की थी, उस बेचारे का पूरा मुँह जल गया था, उसकी पूंछ, पैरों और हाथ में भी बिजली के झुलसने के निशान मौजूद थे, जिन पर यहाँ के कर्मचारियों द्वारा मरहमपट्टी की गयी थी. सबसे अधिक ह्रदय विदारक यही लंगूर का बच्चा लग रहा था. उसकी सारी चंचलता ना जाने कहाँ थी.? क्योंकि वह जिस पिंजरे में रखा गया था, उसमें दो विदेशी टर्की पक्षी और कई देशी मुर्गे-मुर्गी भी बंद थे. वह जिस पीड़ा से गुजर रहा था, वह हमें संकेत से आकर शांत हो अपने पिंजरे के पास की जाली के किनारे हमारे पास आ बैठता था.
 

 

 

 




इसके आगे वाले पिंजरे में बत्तख बंद थीं, उसके बाद नीलगाय और उसके छोटे बच्चे को शिकारी द्वारा मांस ना खाया जाए, से बचाकर लाया गया था और उनको आगे वाले पिंजरे में रखा गया था. उसके आगे वाले एक अँधेरे बंद पिंजरे में एक बहुत ही दुर्लभ प्रजाति का बड़ा सा उल्लू को सुरक्षित रखा गया था, यह हमारे देश की शिक्षा का दुर्भाग्य है कि अनपढ़-अन्धविश्वासी-दुष्ट लोगों के द्वारा उल्लू के सूखे मांस का प्रयोग यौनवर्धक दवा के रूप में और उसकी हड्डियाँ-पंजों-पंखों का प्रयोग तंत्र-मंत्र-इश्क-मुश्क-सौतन-रखैल-वशीकरण-गढ़ा धन बताने के लिया किया जाता है.
 






यह देखते शाम हो आयी थी और पशु-पक्षियों को शाम का खाना-चारा-पानी देने का समय हो गया था, वहाँ के एक काका जी यह काम बहुत ही कुशलता से कर रहे थे. यहाँ गायों को एक अलग शेड में रखा गया है, उनकी संख्या अधिक है. कुछ सीधे लेब्राडोर कुत्तों को घुमाने के लिए उनके ट्रेनर आ चुके थे और हमारे यहाँ से रुखसत होने का समय आ चुका था. शाम के समय यह पूरा करुणाश्रम परिसर पशु-पक्षियों की भांति-भांति की आवाजों-चीखों और उनके कलरव से गुंजायमान हो रहा था, बहुत दूर तक व देर तक यह आवाजें हमारा पीछा करती रहीं, शायद हमको रोकने लिए.?



वीरेन्द्र भाई के आग्रह पर हम लोग फिर इसकी ऊँची पहाड़ी पर चले गए शाम का ढलता सूरज व अपना विश्वविद्यालय दूर से देखने के लिए. जब लौटे तो इस संस्था के बारे में सोचते और विचार करते कि यहाँ दान या पैसा किसी नगद या रसीद के रूप में नहीं लिया जाता है, बल्कि यदि कोई दानादाता इन निरीह प्राणियों को कुछ देना चाहता है, खिलाना चाहता है, तो वह खुद खरीदकर लाये तब दान करे.....
हम दोनों लोगों को लगा कि शायद इसीलिये यह संस्था अब जीवित है और अपनी सहज गति से आगे बढ़ रही है. मैं श्री आशीष गोस्वामी जी के अलावा इसके स्वयं सेवकों श्री किरण मस्वादे, श्री गनेस मसराम व अन्य सभी के नि:स्वार्थ सेवाभाव को नमन करता हूँ. अपने विश्वविद्यालय के सभी छात्रों और शुभ चिंतक रूपी मित्रों से कहूंगा कि वे एक बार जरुर यहाँ जाएँ, शायद वहाँ जाकर उनके मन में करुणा और दयालुता का भाव पैदा हो जाये. यदि आपके मन में कुछ हलचल हो तो उचित है, ना हो तो भी ठीक है. मैं मानता हूँ कि यह मामला केवल असहाय पशुओं-पक्षियों का ही नहीं है, बल्कि यह हमारी सम्पूर्ण मानवीय संवेदनशीलता-दयालुता-करुणा और सभी के प्राणियों के प्रति मैत्रीपूर्ण भाव से भी जुड़ा है.
आपका
डॉ. सुरजीत कुमार सिंह.