Sunday, March 11, 2012

Dr. Surjeet Kumar Singh in Keljhar.





Dr. Surjeet Kumar Singh in Keljhar.





Dr. Surjeet Kumar Singh

Dr. Surjeet Kumar Singh in Nagpur.
Dr. Surjeet Kumar Singh in Nagpur.
Dr. Surjeet Kumar Singh in Keljhar.
Dr. Surjeet Kumar Singh in Keljhar.
Dr. Surjeet Kumar Singh in Keljhar.

Dr. Surjeet Kumar Singh

Dr. Surjeet Kumar Singh with Office.
Dr. Surjeet Kumar Singh with Office.
Dr. Surjeet Kumar Singh with Office.

Dr. Surjeet Kumar Singh





Dr. Surjeet Kumar Singh


On 06 December,2011 Dr. Surjeet Kumar Singh paying Homage to Baba Saheb Dr. Bhimrao Ambedkar Ji @ Ambedkar Chowk, Wardha.


Dr. Surjeet Kumar Singh with his friends Dr. Sunil Kumar Suman, Dr. Vilaswani, Dr. Prafull Moon And Ramesh Siddharth. with Dr. Devanand Kumbhare.

Dr. Surjeet Kumar Singh




Dr. Surjeet Kumar Singh in Ambedkar Students Forum, MGIHU, Wardha.
@26-01-2012.

Dr. Surjeet Kumar Singh

Dr. Surjeet Kumar Singh in Ambedkar Students Forum, MGIHU, Wardha. @26-01-2012.
Dr. Surjeet Kumar Singh, Dr. Sunil Kumar Suman, Dr. Prafull Moon, Dr. Devanand Kumbhare, Miss. Kiran Kumbhare in Ambedkar Students Forum, MGIHU, Wardha. @26-01-2012.


Dr. Surjeet Kumar Singh

Dr. Surjeet Kumar Singh with his Mr. Gillu.
Dr.Surjeet Kumar Singh presented a paper in ISBS,Gangtok.
Dr. Surjeet Kumar Singh with Monks.
Dr. Surjeet Kumar Singh with Monks.
Dr. Surjeet Kumar Singh with Monks and his friends(Gangtok).

Saturday, January 21, 2012

कवि और गायक उत्तम मूले


‎'' ये बुद्ध की धरती, युद्ध न चाहे, चाहे अमनपरस्ती ''.... के कवि और गायक उत्तम मूले की 22 जनवरी,2012 को पहली पुण्यतिथि है..पिछले वर्ष नागपुर में उनका दुखद निर्वाण हो गया था..वे 81 वर्ष के थे..उनका जन्म महाराष्ट्र के बुलढाना नामक जिले में एक ' बेलदार' परिवार में हुआ था.. उन्होंने मात्र 7 वीं कक्षा तक की पढाई की थी..बाबा साहेब के विचारों से प्रभावित होने के बाद श्री मूले ने जीवन भर अविवाहित रहने का निर्णय लिया और अपना पूरा जीवन बाबा साहेब और भगवान बुद्ध के विचार एवं दर्शन के प्रचार- प्रसार में लगा दिया.. मरते समय तक वे गणेशपेठ स्लम की एक साधारण-सी झोंपड़ी में रहते थे.. 1956 ई. की ऐतिहासिक धम्मदीक्षा में वे बाबा साहेब डा.अंबेडकर के साथ ही थे.. उत्तम मूले के गीत पूरे देश में सामाजिक-परिवर्तन की लड़ाई में प्रेरणा-गीत की तरह गाए जाते रहे हैं..तथागत बुद्ध और बाबा साहेब के गीतों के लिए विख्यात श्री उत्तम मूले जी के गीत(सी.डी., कैसेट्स) भारत ही नहीं बल्कि जापान,थाईलैंड,भूटान , बर्मा, नेपाल आदि देशों में भी काफी लोकप्रिय हैं..उनकी कुछ प्रसिद्द रचनाएं हैं -'' बुद्ध की धरती युद्ध न चाहे, चाहे अमन परस्ती, ये बुद्ध की धरती, दीक्षा देकर भीम ने हमको मुक्ति का वरदान दिया, गौतम बुद्ध का संदेश सुनाएं जग को, चलो उठो ये बौद्धों, हमें गौतम बुलाते हैं, जय भीम की गूँज गुंजाता चल, भीम-स्तुति में गाता चल...''उत्तम मूले के लिखे गीतों को उदित नारायण, अनुराधा पौडवाल कविता कृष्णमूर्ति, मिलिंद शिंदे, कृष्णा शिंदे जैसे कई नामचीन गायकों ने गाए..मूले साहब को '' दलित मित्र '' की उपाधि भी प्राप्त हुई थी.

Thursday, January 5, 2012

डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन का जीवन परिचय

चेतना निर्माण ही लक्ष्य

जयंती तुलसा डोंगरे


आधुनिक काल में ऐसे व्यक्तित्व भारत में हुए हैं, जिन्होंने न केवल भारत में बौद्ध धम्म के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि देश-विदेश के बौद्ध समाज को भी एक मंच पर आने के लिएमार्गदर्शन दिया. वैसे ही व्यक्ति का नाम है- डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन. उनका जन्म 5 जनवरी 1905 को सुघना गांव, जिला चंडीगढ., पंजाब प्रांत में हुआ था. उनके बचपन का नाम हरिनाम दास था. उन्होंने खत्री जाति में जन्म लिया. लेकिन वे एक बौद्ध भिक्खु के रूप में जिए. वे अखिल भारतीय बौद्ध भिक्खु संघ के अध्यक्ष थे और प्रशिक्षण संस्थान नागपुर के संस्थापक अध्यक्ष थे. महास्थाविर लुनुपोकुने धम्मानंद के मार्गदर्शन में उन्होंने 1928 में श्रीलंका में बौद्ध धम्म की दीक्षा ली. डॉ. कौसल्यायन ने राष्ट्रभाषा हिन्दी को समृद्ध बनाने में योगदान दिया. इसके लिए हिन्दी विश्‍वविद्यालय प्रयाग ने उन्हें 'साहित्य वाचस्पति' की उपाधि से सम्मानित किया. इसी प्रकार नालंदा महाविहार की ओर से पाली और बौद्धधम्म की सेवा के लिए उन्हें 'विद्या वीरधि' की उपाधि से अलंकृत किया. वे हिन्दी के साहित्यकार भी थे. उनके हिन्दी साहित्य सम्मेलन, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति विदर्भ साहित्य सम्मेलन से घनिष्ठ संबंध रहे. वे विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन की कार्यकारिणी के सदस्य थे. वे कुशल वक्ता और हिन्दी के शैलीकार थे. उनके संस्मरण और अन्य निबंध आज भी साहित्य प्रेमियों द्वारा आदर के साथ पढे. जाते हैं. उन्होंने धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक विषयों पर 100 से अधिक किताबें लिखीं. उनमें से अधिकांश हिन्दी में हैं. अन्य किताबें अंग्रेजी, पाली सिंहली और पंजाबी में हैं. वे भगतसिंह के साथ भी रहे. डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन नागपुर विश्‍वविद्यालय (नागपुर विद्यापीठ) की सीनेट के सदस्य भी रहे. श्रीलंका में 1959 से 1968 तक वे हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने देश-विदेश की काफी यात्राएं की है. वे हमेशा घूमते ही रहते थे. जब वे श्रीलंका से भारत में नागपुर में दीक्षा भूमि पर कुछ समय तक रहे. बाद में वे नागपुर के समीप कामठी रोड स्थित बुद्ध भूमि में 1983 से बस गए. भारत को एक तरह से स्थायी रूप से कर्मभूमि बना लिया था. वे राहुल सांकृत्यायन से प्रभावित थे. उनके बारे में प्रसिद्ध हिन्दी लेखक कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपनी किताब 'क्षण बोले क्षण मुसकाए' को भेंट स्वरुप प्रदान करते हुए उस पर लिखा था कि, मान्य श्री कौसल्यायनजी को सादर, जिनका क्षण सदा बोलता रहा और कण मुस्कराता रहा. भदन्तजी की वाणी और कलम में बड.ी ताकत थी. वे शब्दों के धनी थे. लेकिन जीवन में उन्होंने अपनी वाणी और कलम से धन बटोरने का काम नहीं किया. जो पैसा उनके पास आता था, वे उसको दूसरों पर खर्च कर देते थे. वे कहते थे कि 'मैं तो पोस्टमैन का काम करता हूं. जो पैसा आ जाता है, उसको दूसरों में बांट देता हूं. बौद्ध भिक्खु के रूप में जीवन के अनुभवों का तत्वज्ञान उनके पास था. भदन्तजी एक अच्छे कहानीकार भी थे. बौद्ध साहित्य, इतिहास, संस्कृति से सम्बंधित लेखन के साथ कहानियां लिखने में उनकी विशेष रुचि थी. धर्म परिवर्तन उनकी एक सशक्त कहानी है. वे पंजाबी, हिंदी और उर्दू के भी विद्वान थे. डॉ. बाबासाहब आंबेडकर द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक 'द बुद्धा एंड हिज धम्मा' का हिन्दी में 'भगवान बुद्ध और उनका धर्म' नाम से अनुवाद किया. बौद्ध प्रशिक्षण संस्थान के साथ उन्होंने'राहुल बालसदन' की स्थापना की.वहां अनाथ बच्चों को उन्होंने सहारा दिया. जिसे वे आगे चलकर अच्छे नागरिक बना सकें. इस संस्था में सभी जाति, धर्म और पंथ के बच्चे थे. आज भी यह संस्था कार्यरत है. उनके योगदानों से प्रेरणा मिलती है, जो अविस्मरणीय है.