22.04.2013 Wardha.
23.04.2013 Buddhist Studies Centre, Wardha.
Friday, April 26, 2013
Dr. Surjeet Kumar Singh, Incharge Head, Dr. Bhadant Anand Kusalyayan Centre for Buddhist Studies, Wardha.
Sunday, March 17, 2013
सिविल सेवा परीक्षा में पालि भाषा को हटाए जाने का विरोध
हम आप सभी मित्रों के माध्ययम से भारत के महामहिम राष्ट्रपति का ध्यान
इस तरफ दिला चाहते हैं कि संघ
लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में पालि भाषा काफी लम्बे समय से 2012 तक
रही, लेकिन आयोग की 05.03.2013 की अधिसूचना के अनुसार पालि को वर्ष 2013 की
परीक्षा से हटा दिया गया है। आयोग द्वारा सिविल सेवा परीक्षा से पालि भाषा के विषय
को हटाया जाना भारतीय संविधन द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार एवं धार्मिक
स्वतन्त्रता के अधिकारों का हनन करना है। पालि भाषा के विषय को लेकर सिविल सेवा की
मुख्य परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों की संख्या हजारों में है, जिसमें
से अधिकतर प्रतिभागी सफलता को प्राप्त करते हैं। पालि प्राचीनकाल से ही भारत की
जनभाषा है और भारत पालि भाषा का मूल उद्गम स्थल है। वर्तमान समय में पालि का लगभग 55 विश्वविद्यालयों
में का अध्ययन-अध्यापन एवं शोध हो रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा
प्रतिवर्ष साल में दो बार यू.जी.सी. नेट/जे.आर.एफ. की परीक्षा पालि भाषा और बौद्ध अध्ययन
में अलग-अलग आयोजित की जाती है। सभी लगभग 55 विश्वविद्यालयों और उनसे सम्बद्ध कालेजों में
स्नातक, एम.ए., एम.फिल., पी-एच.डी.
की डिग्री दी जाती है। इसके साथ ही सर्टीफिकेट कोर्स, डिप्लोमा कोर्स एवं
पालि आचार्य की भी उपाधि दी जाती है।
पालि
भाषा भारत के सांस्कृतिक सम्बन्धों के मेलजोल बढ़ाने की भी एक महत्वपूर्ण भाषा है।
पालि भाषा हमारे भारत की विदेशी नीति का आधार भी है। यह सार्क देशों और दक्षिणी
एशियाई देशों के साथ हमारी विदेश नीतियों को प्रभावित करती है। पालि भाषा के बिना
प्राचीन भारतीय इतिहास को जानना कठिन ही नहीं,
अपितु असम्भव भी है, पालि के बिना प्राचीन
भारतीय इतिहास की व्याख्या नहीं कर सकते। क्योंकि पालि भाषा भारत की प्राच्य भाषा है।
वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, बिहार
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, एवं महाराष्ट्र माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में भी
पालि की पढ़ाई हाईस्कूल एवं
इण्टरमीडिएट कक्षाओं में की जाती है।
उपर्युक्त
तर्क से स्पष्ट है कि पालि भाषा को सिविल सेवा से हटाने से अल्पसंख्यक बौद्ध समाज
बहुत दुःखी एवं आहत हुआ है। साथ ही उनके आर्थिक, व्यक्तिगत, शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक
व सांस्कृतिक व राजनीतिक विकास को अवरुद्ध कर दिया गया है। इससे न केवल बौद्ध समाज
के हितों पर कुठाराघात हुआ है, अपितु सिविल सेवा हेतु प्रयासरत् सभी समुदायों
के प्रतिभागियों का भविष्य भी अन्धकारमय हो गया है। इसके अलावा प्राचीन भारतीय धर्म-दर्शन, संस्कृति एवं
इतिहास के इच्छुक व्यक्तियों के लिए भी अहितकर है। पालि भाषा को सिविल सेवा से हटाकर
भारत के महापुरुष भगवान बुद्ध के उपदेशों का अपमान भी किया है।
पालि
वह भाषा है, जिसके कारण भारत को दुनिया में जाना जाता है और जो सम्पूर्ण विश्व को शान्ति, दया, करुणा और
मैत्री का उपदेश देती है। अतः उपरोक्त बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए तथा पालि के
उचित संरक्षण व संवर्धन हेतु आप सभी
के माध्ययम से विनम्र निवेदन है कि पालि भाषा व साहित्य को पुनः सिविल सेवा के
पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने हेतु उचित कार्यवाही को करने की कृपा करें।
सधन्यवाद.
भवदीय
(डॉ. सुरजीत कुमार सिंह)
महासचिव
पालि भाषा एवं साहित्य अनुसंधान
परिषद्
सी-२९,छात्रा मार्ग, दिल्ली
विश्वविद्यालय,दिल्ली.
Mob.926055256,Email:surjeetdu@gmail.com
Tuesday, December 4, 2012
शोध-पत्रिका 'संगायन' का विमोचन
दून विश्वविद्यालय में हुआ बौद्ध अध्ययन में अन्तरराष्ट्रीय स्तर की शोध-पत्रिका 'संगायन' का विमोचन.
बौद्ध अध्ययन में शोध को मिलेगा बल - संपादक डॉ. सुरजीत कुमार सिंह
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र के प्रभारी अध्यक्ष डॉ.सुरजीत कुमार सिंह द्वारा संपादित बौद्ध अध्ययन की अंतरराष्ट्रीय स्तर की अर्द्ध वार्षिक शोध पत्रिका 'संगायन' के प्रथम अंक का लोकार्पण हाल ही में भारतीय बौद्ध अध्ययन सोसाइटी की 12 वीं वार्षिक कांग्रेस में 02 नवम्बर, 2012 को देहरादून के दून विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की निदेशक प्रो.दीप्ति त्रिपाठी के द्वारा किया गया। इस अवसर पर दून विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.बी.के.जैन, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार की पूर्व कुलपति प्रो.सुधारानी पांडे, नवनालंदा महाविहार के पूर्व निदेशक प्रो. उमाशंकर व्यास, भारतीय बौद्ध अध्ययन सोसाइटी के अध्यक्ष प्रो.सत्य प्रकाश शर्मा, 12 वीं बौद्ध अध्ययन काँग्रेस के महासचिव प्रो.भागचंद्र जैन और भारतीय बौद्ध अध्ययन सोसाइटी के महासचिव प्रो.वैद्यनाथ लाभ मंचस्थ थे। इस अवसर पर देश-विदेश के बौद्ध अध्ययन व पालि भाषा से जुड़े विद्वान व शोधार्थी उपस्थित थे।
'संगायन' शोध पत्रिका का प्रकाशन पालि भाषा एवं साहित्य अनुसंधान परिषद के द्वारा किया गया है। संगायन पत्रिका के संपादक मण्डल में पालि भाषा एवं साहित्य अनुसंधान परिषद के संरक्षक व अध्यक्ष प्रो. भिक्षु सत्यपाल महाथेर, प्रो.एम.के.दास, प्रो.के.टी.एस.सराओ, प्रो.वैद्यनाथ लाभ, प्रो.संघसेन सिंह, प्रो. अंगराज चौधरी और प्रो.भालचंद्र खांडेकर शामिल हैं। पत्रिका में देश भर के बौद्ध विद्वान और चिंतकों के अंग्रेजी एवं हिंदी में शोध आलेख प्रकाशित किये गये हैं। 'संगायन' के प्रधान संपादक डॉ.सुरजीत कुमार सिंह ने बताया कि आने वाले समय में इस पत्रिका में विदेशों के बौद्ध चिंतकों के शोध लेख भी प्रकाशित किये जायेंगे। उन्होंने आशा जताई कि बौद्ध धम्म के वैश्विक प्रचार-प्रसार को इस पत्रिका से माध्यम से और बल मिलेगा।
Friday, November 9, 2012
बौद्ध तत्वज्ञान में विज्ञान ही मनुष्य के विकास का है आधार-प्रो. सत्यपाल
हिंदी विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म दर्शन की प्रासंगिकता पर हुआ व्याख्यान
बौद्ध धर्म दर्शन की प्रासंगिकता विषय पर पालि आचार्य अग्गयमहापण्डित तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. भिक्षु सत्यपाल महाथेर ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में आयोजित विशेष व्याख्यान में कहा कि बौद्ध तत्वज्ञान में विज्ञान ही मनुष्य के विकास का आधार है। उन्होंने ईश्वर संकल्पना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बौद्ध दर्शन में चार आर्यसत्य को ही आधार माना गया है।
विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर सभागार में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति विभूति नारायण राय ने की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र के प्रभारी अध्यक्ष डॉ. सुरजीत कुमार सिंह ने किया। कुलपति विभूति नारायण राय ने प्रो.सतपाल का स्वागत किया तथा व्याख्यान के लिए आभार भी व्यक्त किया। सभागार में उपस्थित श्रोताओं ने प्रो. भिक्षु सतपाल से अपनी जिज्ञासाएं व्यक्त कर कार्यक्रम को जीवंत बनाया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के राइटर-इन-रेजीडेंस व कथाकार संजीव, प्रो.रामवीर सिंह, प्रो. अनिल के राय अंकित, राजकिशोर, अशोक मिश्र, नृपेन्द्र प्रसाद मोदी सहित बड़ी संख्या में अध्यापक, कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित थे।
SANGAYANA The International journal of Buddhist Studies
SANGAYANA The International journal of Buddhist Studies
Tuesday, September 25, 2012
SANCHI UNIVERSITY OF BUDDHIST & INDIC STUDIES
Wednesday, August 29, 2012
सांची में खोला जाएगा बौद्ध विश्वविद्यालय
"साँची बौद्ध विश्वविद्यालय", साँची
भोपाल. बौद्ध धर्मावलंबियों के मध्यप्रदेश में स्थित विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल सांची में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एक विश्वविद्यालय स्थापित किया जाएगा. विश्वविद्यालय का शिलान्यास आगामी 21 सितंबर को किया जाएगा. राज्य के उच्च शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने आज यहां पत्रकारों को बताया कि बौद्ध विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी. इसी के अनुरूप राज्य के संस्कृति विभाग ने सांची में "सांची बौद्ध विश्वविद्यालय" की स्थापना की योजना बनायी है. इसके शिलान्यास के मौके पर देश-विदेश के बौद्ध विद्वान और अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहेंगे. शर्मा ने बताया कि राज्य सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बौद्ध विश्वविद्यालय खोलने के संबंध में केंद्र सरकार के साथ पत्राचार किया था, लेकिन उसने कहा कि फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर का विश्वविद्यालय नहीं खोला जा सकता है. इसके बाद राज्य सरकार ने अपने ही संसाधनों से सांची में बौद्ध विश्वविद्यालय खोलने की योजना पर अमल करने का निर्णय लिया. शर्मा ने कहा कि बौद्ध धर्म से संबंधित विश्व का पहला विशेष सम्मेलन "धर्म-धम्म" भोपाल में 22 और 23 सितंबर को आयोजित किया जाएगा. इसमें देश के साथ ही 22 देशों के बौद्ध धर्म के विद्वान और अन्य लोग उपस्थित होंगे. इसमें शामिल होने के लिए आने वाले विद्वान 21 सितंबर को सांची में बौद्ध विश्वविद्यालय के शिलान्यास के अवसर पर मौजूद रहेंगे.
बौद्ध धर्म के विख्यात विद्वान भोपाल में जुटेंगे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में:-मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बौद्ध धर्म से जुड़ा विश्व का अपने तरह का पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन यहां 22 सितंबर को प्रारंभ होगा, जिसमें चीन, इजराइल और जापान समेत 22 देशों के प्रतिनिधि शिरकत करेंगे. इस दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उदघाटन थाईलैंड की राजकुमारी महाचक्री शिरिन्धौर करेंगी. "धर्म-धम्म" से जुड़ी एकरूपताओं और भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न विषयों पर चर्चा के लिए आयोजित इस सम्मेलन में ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड, वियतनाम, मिश्र, इंडोनेशिया और अन्य देशों के प्रतिनिधि शिरकत करेंगे. इसमें डॉ.भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केन्द्र, महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय , वर्धा के प्रभारी अध्यक्ष डॉ. सुरजीत कुमार सिंह को भी जाने का अवसर मिल रहा है.
नबभारत Tuesday, 21 August 2012 20:13
Sunday, August 5, 2012
Elephantas Caves
ऐलीफेंटा गुफाएं: बेमिसाल कला का नमूना
इसी महीने विश्व विख्यात ऐलीफेंटा गुफाओं में सालाना महोत्सव का आयोजन किया गया। इस दौरान नृत्य व संगीत के क्षेत्र की कई हस्तियों ने यहां अपने फन का जादू बिखेरा। आप अगर वहां जाने का यह मौका चूक भी गए हों तो कोई हर्ज नहीं क्योंकि यहां साल में किसी भी वक्त जा सकते हैं।
खजुराहो की ही तरह इन्हें भी यूनेस्को की तरफ से विश्व विरासत का दरजा मिला हुआ है। इन्हें यह दरजा 1987 में दिया गया था। ऐलीफेंटा द्वीप पर स्थित ये गुफाएं शैव मतावलंबियों का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि शिव के विभिन्न रूपों वाली कई अद्भुत प्रतिमाएं यहां मौजूद हैं। ये प्रतिमाएं न केवल उस समय की मूर्तिकला के बारे में बल्कि धार्मिक मान्यताओं के बारे में भी कई बातें कहती हैं।
ये गुफाएं कब गढ़ी गईं, इस बारे में बिलकुल पुष्ट तौर पर जानकारी कम ही मिलती है। कहा जाता है कि सिल्हारा राजाओं ने नौंवी से लेकर तेरहवीं सदी ईस्वी के बीच इन्हें बनवाया। मन्याखेटा (मौजूदा कर्नाटक) के तत्कालीन राष्ट्रकूट राजाओं का शिल्प भी कई मूतियों में झलकता है। रोचक बात यह है कि यह समय भारतीय शिल्प के लिहाज से स्वर्णिम दौर था जब उत्तर में चंबा और मध्य भारत में खजुराहो से लेकर पूर्व में कोणार्क तक के मंदिर बनवाए गए। ये सभी शिल्प की दृष्टि से इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। कोंकणी मौर्योके समय तक इस द्वीप को घारापुरी कहा जाता था। बाद में एक हाथी की प्रतिमा मिलने से इसे ऐलीफेंटा नाम मिल गया।
ऐलीफेंटा गुफाओं को इस तरह से गढ़ा गया था कि प्रतिमाओं समेत साठ हजार वर्ग फुट में फैला समूचा परिसर ही अपने आप में एक शिल्प सरीखा प्रतीत होता है। चट्टानों को काट-काटकर अंदर की जगह, स्तंभ और दीवारों पर दैवरूप तैयार किए गए। इस मायने में यह समूचा शिल्प बेजोड़ लगता है। इसका दूर समुद्र में एक द्वीप पर होना तो इसे और भी हैरतअंगेज बनाता है। परिसर में बने लंबे गलियारों और कक्षों को देखकर हैरत होती है कि इन्हें पहाड़ के भीतर कैसे गढ़ा गया होगा। इनमें से कई जगह कोरी चट्टानें जस की तस हैं तो कई चट्टानों पर इतना बारीक काम है कि दांतों तले उंगली दबानी पड़े। यहां शिव की ज्यादातर प्रतिमाएं आदमकद या उससे भी बड़ी हैं। परिसर में एक मुख्य कक्ष है। अलग-बगल कई और मंदिर भी हैं। जबकि मुख्य मंदिर के ऊपर का हिस्सा कोरी चट्टानों का है। मंदिर में प्रवेश के तीन द्वार हैं। पूर्वी व पश्चिमी द्वारों को जोड़ने वाला गलियारा ही एक तरह से मंदिर की धुरी है जिसमें बीस स्तंभ गढ़े गए हैं।
ऐलीफेंटा में शिव की त्रिमूर्ति अपने आप में ऐसी प्रतिमा है केवल जिसे देखने ही ऐलीफेंटा जाया जा सकता है। कई इतिहासकार ईश्वर के भौतिक स्वरूप को दरशाने वाली इस त्रिमूर्ति को पूरी दुनिया में बेमिसाल बताते हैं। हिंदू मान्यता में त्रिमूर्ति में ब्रह्मा, विष्णु, महेश को दरशाया जाता है। लेकिन यह बीस फुट ऊंची त्रिमूर्ति महेश यानी शिव के ही तीन रूपों की है। एक चेहरे में शिव को उत्तेजक होठों वाले युवा के रूप में दिखाया गया है। यह छवि सृष्टि के रचियता ब्रह्मा से मिलती-जुलती है। दूसरा चेहरा मूंछधारी युवा का है जिसके चेहरे से गुस्सा झलक रहा है। यह छवि विनाशक रुद्र से मिलती है। तीसरा चेहरा जो मध्य में है, वह पालक सरीखे शांत और ध्यानमग्न व्यक्ति का है। यह योगेश्वर की छवि देता है। यानी पारंपरिक रूप से जो छवियां ब्रह्मा, विष्णु व महेश की रही हैं, वे तीनों छवियां शिव के ही रूपों में दिखाई गई हैं। कहा यह भी जाता है कि यह पंचमुखी शिव के ही तीन चेहरे हैं जो चट्टान पर गढ़े गए हैं। इसी तरह ऐलीफेंटा गुफाओं की दक्षिण दीवार पर कल्याणसुंदरा, गंगाधरा, अर्धनारीश्वर व उमा महेश्वर के रूप में शिव की प्रतिमाएं हैं। उत्तरी प्रवेश द्वार के बाई ओर नटराज और दाई ओर योगीश्वर के रूप में भी शिव की मूर्तियां हैं। यहां महेश शिवलिंग के रूप में भी हैं और विभिन्न रूपों में भी। मुख्य मंदिर के पूरब में एक अन्य मंदिर के कक्ष में शिव पुराण से जुड़ी कहानियां दरशाई गई हैं।
ऐलीफेंटा गुफाएं बाम्बे हार्बर में एक द्वीप पर स्थित हैं। मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के निकट स्थित अपोलो बंदर से यहां के लिए रोजाना दिन में कई बार मोटर लांच चलते हैं जो लगभग घंटे भर में नौ समुद्री मील दूर गुफाओं में पहुंचा देते हैं। मानसून के दौरान यहां जाने में दिक्कत होती है और उस समय मोटरबोट सेवा स्थगित भी हो सकती है। लिहाजा यहां जाने का सर्वश्रेष्ठ समय नवंबर से मार्च तक है। टिकट व बोट के जाने के समय की जानकारी गेटवे ऑफ इंडिया पर मिल जाती है। सोमवार को यहां प्रवेश बंद होता है और शुक्रवार को प्रवेश मुफ्त रहता है। द्वीप पर जहां नाव उतारती हैं, वहां से गुफाओं तक सीढि़यां जाती हैं। यहां महाराष्ट्र पर्यटन का होटल व रेस्तरां भी है लेकिन द्वीप पर रात में रुकने की इजाजत नहीं है। शाम पांच बजे सभी पर्यटकों को द्वीप छोड़ना होता है
BUDDHIST SITES IN ORISSA. BUDDHISM IN ORISSA.
उड़ीसा में बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र
उड़ीसा में ऐसी कई जगहें हैं, जिनके बारे में अभी भी पूरी जानकारी दुनिया को नहीं है। प्रकृति के चमत्कारों के अलावा यहां बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेष भी हैं। जिस तरह कपिलवस्तु, बोधगया व सारनाथ का संबंध भगवान बुद्ध के जीवन से है, वैसे ही उड़ीसा का संबंध उनके दर्शन से है। राज्य के लगभग हर हिस्से से बौद्ध दर्शन से जुड़ी चीजें मिल चुकी हैं। 261 ई. पू. में हुए कलिंग युद्ध के बाद यहां बौद्ध धर्म की लोकप्रियता बढ़ी। इसके बाद ही सम्राट अशोक का हृदयपरिवर्तन हुआ और सुदूर पूर्व व दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म का विस्तार शुरू हुआ। उड़ीसा से बौद्ध धर्म के जुड़ाव के प्रमाण चीनी यात्री ह्वेन सांग की डायरी, अशोक के समय व उनके बाद के स्तूप, ताम्रपत्र, बौद्ध साहित्य और तमाम चित्रों से भी मिलते हैं।
चीनी यात्रियों फाह्यान व ह्वेन सांग के अनुसार यहां बौद्ध धर्म महायान और हीनयान आदि सभी रूपों में मौजूद था। बौद्ध धर्म की तांत्रिक शाखा के कई रूपों वज्रयान, कालचक्रयान व सहजयान आदि का उड़ीसा बड़ा केंद्र था। वैसे राज्य के सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बौद्ध पुरावशेष मौजूद हैं, पर बौद्ध शिल्प व दस्तावेजों का बड़ा खजाना रत्नगिरि, ललितगिरि और उदयगिरि में है। इनसे जुड़ी लांगुडी की पहाडि़यों में भी हाल ही में कुछ चित्र मिले हैं, जो सम्राट अशोक के बताए गए हैं।
रत्नगिरि
भुवनेश्वर से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित यह पहाड़ी ब्राह्मणी, किम्हिरिया और बिरूपा नदियों से घिरी है। सन 1985 में हुई खुदाई के दौरान यहां से एक विशाल स्तूप, दो बड़े मठ, एक छोटा मठ, कई छोटे-छोटे स्तूप, शिलालेख, कांसे की प्रतिमाओं और टेराकोटा मुद्राओं के अलावा कई अवशेष पाए गए थे। यहां ईटों से बने विशाल स्तूप के अवशेषों से पता चलता है कि कभी श्री रत्नगिरि महाविहार आर्यभिक्षु संघ यहीं रहा है। यहां पाई गई 5वीं से 13वीं शताब्दी के बीच की मुद्राओं से भी जाहिर होता है कि उस समय यहां बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था। यहां पत्थर के स्तूपों पर वज्रयान के प्रतीक भी खुदे हैं, जिनसे यहां तांत्रिक बौद्धों के प्रभाव की पुष्टि होती है। यहां मिली भगवान बुद्ध, बोधिसत्व, तारा व कई देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से भी ऐसा जाहिर होता है। इससे जुड़े संग्रहालय में कई अभिलेख, कलाकृतियां व दस्तावेज सुरक्षित हैं।
ललितगिरि
रत्नगिरि के पास मौजूद ललितगिरि का महत्व 1985 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा की गई खुदाई के बाद पता चला। यहां बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियों समेत सैकड़ों कलाकृतियां मिली थीं। अपने अनुभवों तथा रीति-रिवाजों को संरक्षित रखने के लिए उड़ीसा के लोगों ने अनूठी विधि ईजाद की है। यह जानकारी एक स्तूप पर लगे शिलालेखों से मिली। खांडोली पत्थर पर बने इस शिलापत्र पर भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाएं चित्रित हैं। यहां पत्थरों व पक्की ईटों से बने तीन बौद्ध विहार पाए गए हैं। खुदाई के दौरान यहां मिली कलाकृतियों में सबसे महत्वपूर्ण वह है जिसमें भगवान बुद्ध का स्वर्ग से अवतरण दिखाया गया है।
उदयगिरि
रत्नगिरि से पांच और भुवनेश्वर से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद उदयगिरि कभी बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था। यहां दो बौद्ध मठ तथा एक विशाल स्तूप के अवशेष मिल चुके हैं। स्तूप के चारों कोनों पर ध्यान मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। इसमें भूमिस्पर्श, धर्मचक्र, अभय, वरद तथा ध्यान मुद्रा में भगवान बुद्ध की छवियां भी बनी हैं। यहां मिली चीजों में मिट्टी की अभिलिखित मुद्राएं अति महत्वपूर्ण हैं।
लांगुडी पर्वत
रत्नगिरि, उदयगिरि और ललितगिरि से थोड़ी ही दूरी पर मौजूद है लांगुडी हिल। केलुआ नदी के तट पर स्थित इस स्थल की दूरी भुवनेश्वर से 85 किलोमीटर है। खुदाई के दौरान यहां से सम्राट अशोक के दो चित्र प्राप्त किए गए। ध्यान रहे कि यही एक जगह है जहां अशोक के चित्र मिले हैं। पत्थरों को काट कर बनाया गया स्तूप तथा यहां से प्राप्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण कलाकृतियां भी इस बात की सबूत हैं कि किसी समय यह बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
अन्य स्थल
उड़ीसा में ऐसा एक भी जिला नहीं है, जहां बौद्ध धर्म से जुड़ी कुछ न कुछ चीजें न पाई गई हों। इन जगहों में प्राची घाटी में स्थित कुरुमा, चौरासी, जुइंती, खुर्दा जिले में बानपुर, पुरी जिले में विश्वनाथ हिल्स और अष्टरंग, कटक जिले में चौद्वार, कुरुकुल्ला व लटहारन, जाजपुर जिले में जाजपुर, सोलमपुर व खादीपाड़ा, केंद्रपारा में केंद्रपारा, बालासोर में बालासोर व अयोध्या, गंजम में जूनागढ़ व बुद्धाखोल, मयूरभंज जिले में खिछिंग, उडाला और बड़ीपदा, संभलपुर जिले में गनियापल्ली व मेल्चामुंडा, बौद्ध जिले में बाद्ध, सोनपुर जिले में सोनपुर तथा बोलांगीर जिले में बिनका आदि भी उड़ीसा में बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
जरूरी जानकारियां
निकटतम हवाई अड्डा : भुवनेश्वर
निकटतम रेलवे स्टेशन : जाजपुर-क्योंझर सड़क से भी यहां पहुंचा जा सकता है भुवनेश्र्वर से आप पूरे बौद्ध परिपथ की यात्रा ओटीडीसी बस या टैक्सी या फिर कार से कर सकते हैं।
ठहरना : ठहरने के लिए आप को पथराजपुर या भुवनेश्वर में कई अच्छे होटल मिल सकते हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय, NALANDA UNIVERSITY
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