Friday, November 9, 2012
SANGAYANA The International journal of Buddhist Studies
SANGAYANA The International journal of Buddhist Studies
Tuesday, September 25, 2012
SANCHI UNIVERSITY OF BUDDHIST & INDIC STUDIES
Wednesday, August 29, 2012
सांची में खोला जाएगा बौद्ध विश्वविद्यालय
"साँची बौद्ध विश्वविद्यालय", साँची
भोपाल. बौद्ध धर्मावलंबियों के मध्यप्रदेश में स्थित विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल सांची में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एक विश्वविद्यालय स्थापित किया जाएगा. विश्वविद्यालय का शिलान्यास आगामी 21 सितंबर को किया जाएगा. राज्य के उच्च शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने आज यहां पत्रकारों को बताया कि बौद्ध विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी. इसी के अनुरूप राज्य के संस्कृति विभाग ने सांची में "सांची बौद्ध विश्वविद्यालय" की स्थापना की योजना बनायी है. इसके शिलान्यास के मौके पर देश-विदेश के बौद्ध विद्वान और अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहेंगे. शर्मा ने बताया कि राज्य सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बौद्ध विश्वविद्यालय खोलने के संबंध में केंद्र सरकार के साथ पत्राचार किया था, लेकिन उसने कहा कि फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर का विश्वविद्यालय नहीं खोला जा सकता है. इसके बाद राज्य सरकार ने अपने ही संसाधनों से सांची में बौद्ध विश्वविद्यालय खोलने की योजना पर अमल करने का निर्णय लिया. शर्मा ने कहा कि बौद्ध धर्म से संबंधित विश्व का पहला विशेष सम्मेलन "धर्म-धम्म" भोपाल में 22 और 23 सितंबर को आयोजित किया जाएगा. इसमें देश के साथ ही 22 देशों के बौद्ध धर्म के विद्वान और अन्य लोग उपस्थित होंगे. इसमें शामिल होने के लिए आने वाले विद्वान 21 सितंबर को सांची में बौद्ध विश्वविद्यालय के शिलान्यास के अवसर पर मौजूद रहेंगे.
बौद्ध धर्म के विख्यात विद्वान भोपाल में जुटेंगे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में:-मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बौद्ध धर्म से जुड़ा विश्व का अपने तरह का पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन यहां 22 सितंबर को प्रारंभ होगा, जिसमें चीन, इजराइल और जापान समेत 22 देशों के प्रतिनिधि शिरकत करेंगे. इस दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उदघाटन थाईलैंड की राजकुमारी महाचक्री शिरिन्धौर करेंगी. "धर्म-धम्म" से जुड़ी एकरूपताओं और भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न विषयों पर चर्चा के लिए आयोजित इस सम्मेलन में ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड, वियतनाम, मिश्र, इंडोनेशिया और अन्य देशों के प्रतिनिधि शिरकत करेंगे. इसमें डॉ.भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केन्द्र, महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय , वर्धा के प्रभारी अध्यक्ष डॉ. सुरजीत कुमार सिंह को भी जाने का अवसर मिल रहा है.
नबभारत Tuesday, 21 August 2012 20:13
Sunday, August 5, 2012
Elephantas Caves
ऐलीफेंटा गुफाएं: बेमिसाल कला का नमूना
इसी महीने विश्व विख्यात ऐलीफेंटा गुफाओं में सालाना महोत्सव का आयोजन किया गया। इस दौरान नृत्य व संगीत के क्षेत्र की कई हस्तियों ने यहां अपने फन का जादू बिखेरा। आप अगर वहां जाने का यह मौका चूक भी गए हों तो कोई हर्ज नहीं क्योंकि यहां साल में किसी भी वक्त जा सकते हैं।
खजुराहो की ही तरह इन्हें भी यूनेस्को की तरफ से विश्व विरासत का दरजा मिला हुआ है। इन्हें यह दरजा 1987 में दिया गया था। ऐलीफेंटा द्वीप पर स्थित ये गुफाएं शैव मतावलंबियों का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि शिव के विभिन्न रूपों वाली कई अद्भुत प्रतिमाएं यहां मौजूद हैं। ये प्रतिमाएं न केवल उस समय की मूर्तिकला के बारे में बल्कि धार्मिक मान्यताओं के बारे में भी कई बातें कहती हैं।
ये गुफाएं कब गढ़ी गईं, इस बारे में बिलकुल पुष्ट तौर पर जानकारी कम ही मिलती है। कहा जाता है कि सिल्हारा राजाओं ने नौंवी से लेकर तेरहवीं सदी ईस्वी के बीच इन्हें बनवाया। मन्याखेटा (मौजूदा कर्नाटक) के तत्कालीन राष्ट्रकूट राजाओं का शिल्प भी कई मूतियों में झलकता है। रोचक बात यह है कि यह समय भारतीय शिल्प के लिहाज से स्वर्णिम दौर था जब उत्तर में चंबा और मध्य भारत में खजुराहो से लेकर पूर्व में कोणार्क तक के मंदिर बनवाए गए। ये सभी शिल्प की दृष्टि से इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। कोंकणी मौर्योके समय तक इस द्वीप को घारापुरी कहा जाता था। बाद में एक हाथी की प्रतिमा मिलने से इसे ऐलीफेंटा नाम मिल गया।
ऐलीफेंटा गुफाओं को इस तरह से गढ़ा गया था कि प्रतिमाओं समेत साठ हजार वर्ग फुट में फैला समूचा परिसर ही अपने आप में एक शिल्प सरीखा प्रतीत होता है। चट्टानों को काट-काटकर अंदर की जगह, स्तंभ और दीवारों पर दैवरूप तैयार किए गए। इस मायने में यह समूचा शिल्प बेजोड़ लगता है। इसका दूर समुद्र में एक द्वीप पर होना तो इसे और भी हैरतअंगेज बनाता है। परिसर में बने लंबे गलियारों और कक्षों को देखकर हैरत होती है कि इन्हें पहाड़ के भीतर कैसे गढ़ा गया होगा। इनमें से कई जगह कोरी चट्टानें जस की तस हैं तो कई चट्टानों पर इतना बारीक काम है कि दांतों तले उंगली दबानी पड़े। यहां शिव की ज्यादातर प्रतिमाएं आदमकद या उससे भी बड़ी हैं। परिसर में एक मुख्य कक्ष है। अलग-बगल कई और मंदिर भी हैं। जबकि मुख्य मंदिर के ऊपर का हिस्सा कोरी चट्टानों का है। मंदिर में प्रवेश के तीन द्वार हैं। पूर्वी व पश्चिमी द्वारों को जोड़ने वाला गलियारा ही एक तरह से मंदिर की धुरी है जिसमें बीस स्तंभ गढ़े गए हैं।
ऐलीफेंटा में शिव की त्रिमूर्ति अपने आप में ऐसी प्रतिमा है केवल जिसे देखने ही ऐलीफेंटा जाया जा सकता है। कई इतिहासकार ईश्वर के भौतिक स्वरूप को दरशाने वाली इस त्रिमूर्ति को पूरी दुनिया में बेमिसाल बताते हैं। हिंदू मान्यता में त्रिमूर्ति में ब्रह्मा, विष्णु, महेश को दरशाया जाता है। लेकिन यह बीस फुट ऊंची त्रिमूर्ति महेश यानी शिव के ही तीन रूपों की है। एक चेहरे में शिव को उत्तेजक होठों वाले युवा के रूप में दिखाया गया है। यह छवि सृष्टि के रचियता ब्रह्मा से मिलती-जुलती है। दूसरा चेहरा मूंछधारी युवा का है जिसके चेहरे से गुस्सा झलक रहा है। यह छवि विनाशक रुद्र से मिलती है। तीसरा चेहरा जो मध्य में है, वह पालक सरीखे शांत और ध्यानमग्न व्यक्ति का है। यह योगेश्वर की छवि देता है। यानी पारंपरिक रूप से जो छवियां ब्रह्मा, विष्णु व महेश की रही हैं, वे तीनों छवियां शिव के ही रूपों में दिखाई गई हैं। कहा यह भी जाता है कि यह पंचमुखी शिव के ही तीन चेहरे हैं जो चट्टान पर गढ़े गए हैं। इसी तरह ऐलीफेंटा गुफाओं की दक्षिण दीवार पर कल्याणसुंदरा, गंगाधरा, अर्धनारीश्वर व उमा महेश्वर के रूप में शिव की प्रतिमाएं हैं। उत्तरी प्रवेश द्वार के बाई ओर नटराज और दाई ओर योगीश्वर के रूप में भी शिव की मूर्तियां हैं। यहां महेश शिवलिंग के रूप में भी हैं और विभिन्न रूपों में भी। मुख्य मंदिर के पूरब में एक अन्य मंदिर के कक्ष में शिव पुराण से जुड़ी कहानियां दरशाई गई हैं।
ऐलीफेंटा गुफाएं बाम्बे हार्बर में एक द्वीप पर स्थित हैं। मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के निकट स्थित अपोलो बंदर से यहां के लिए रोजाना दिन में कई बार मोटर लांच चलते हैं जो लगभग घंटे भर में नौ समुद्री मील दूर गुफाओं में पहुंचा देते हैं। मानसून के दौरान यहां जाने में दिक्कत होती है और उस समय मोटरबोट सेवा स्थगित भी हो सकती है। लिहाजा यहां जाने का सर्वश्रेष्ठ समय नवंबर से मार्च तक है। टिकट व बोट के जाने के समय की जानकारी गेटवे ऑफ इंडिया पर मिल जाती है। सोमवार को यहां प्रवेश बंद होता है और शुक्रवार को प्रवेश मुफ्त रहता है। द्वीप पर जहां नाव उतारती हैं, वहां से गुफाओं तक सीढि़यां जाती हैं। यहां महाराष्ट्र पर्यटन का होटल व रेस्तरां भी है लेकिन द्वीप पर रात में रुकने की इजाजत नहीं है। शाम पांच बजे सभी पर्यटकों को द्वीप छोड़ना होता है
BUDDHIST SITES IN ORISSA. BUDDHISM IN ORISSA.
उड़ीसा में बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र
उड़ीसा में ऐसी कई जगहें हैं, जिनके बारे में अभी भी पूरी जानकारी दुनिया को नहीं है। प्रकृति के चमत्कारों के अलावा यहां बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेष भी हैं। जिस तरह कपिलवस्तु, बोधगया व सारनाथ का संबंध भगवान बुद्ध के जीवन से है, वैसे ही उड़ीसा का संबंध उनके दर्शन से है। राज्य के लगभग हर हिस्से से बौद्ध दर्शन से जुड़ी चीजें मिल चुकी हैं। 261 ई. पू. में हुए कलिंग युद्ध के बाद यहां बौद्ध धर्म की लोकप्रियता बढ़ी। इसके बाद ही सम्राट अशोक का हृदयपरिवर्तन हुआ और सुदूर पूर्व व दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म का विस्तार शुरू हुआ। उड़ीसा से बौद्ध धर्म के जुड़ाव के प्रमाण चीनी यात्री ह्वेन सांग की डायरी, अशोक के समय व उनके बाद के स्तूप, ताम्रपत्र, बौद्ध साहित्य और तमाम चित्रों से भी मिलते हैं।
चीनी यात्रियों फाह्यान व ह्वेन सांग के अनुसार यहां बौद्ध धर्म महायान और हीनयान आदि सभी रूपों में मौजूद था। बौद्ध धर्म की तांत्रिक शाखा के कई रूपों वज्रयान, कालचक्रयान व सहजयान आदि का उड़ीसा बड़ा केंद्र था। वैसे राज्य के सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बौद्ध पुरावशेष मौजूद हैं, पर बौद्ध शिल्प व दस्तावेजों का बड़ा खजाना रत्नगिरि, ललितगिरि और उदयगिरि में है। इनसे जुड़ी लांगुडी की पहाडि़यों में भी हाल ही में कुछ चित्र मिले हैं, जो सम्राट अशोक के बताए गए हैं।
रत्नगिरि
भुवनेश्वर से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित यह पहाड़ी ब्राह्मणी, किम्हिरिया और बिरूपा नदियों से घिरी है। सन 1985 में हुई खुदाई के दौरान यहां से एक विशाल स्तूप, दो बड़े मठ, एक छोटा मठ, कई छोटे-छोटे स्तूप, शिलालेख, कांसे की प्रतिमाओं और टेराकोटा मुद्राओं के अलावा कई अवशेष पाए गए थे। यहां ईटों से बने विशाल स्तूप के अवशेषों से पता चलता है कि कभी श्री रत्नगिरि महाविहार आर्यभिक्षु संघ यहीं रहा है। यहां पाई गई 5वीं से 13वीं शताब्दी के बीच की मुद्राओं से भी जाहिर होता है कि उस समय यहां बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था। यहां पत्थर के स्तूपों पर वज्रयान के प्रतीक भी खुदे हैं, जिनसे यहां तांत्रिक बौद्धों के प्रभाव की पुष्टि होती है। यहां मिली भगवान बुद्ध, बोधिसत्व, तारा व कई देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से भी ऐसा जाहिर होता है। इससे जुड़े संग्रहालय में कई अभिलेख, कलाकृतियां व दस्तावेज सुरक्षित हैं।
ललितगिरि
रत्नगिरि के पास मौजूद ललितगिरि का महत्व 1985 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा की गई खुदाई के बाद पता चला। यहां बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियों समेत सैकड़ों कलाकृतियां मिली थीं। अपने अनुभवों तथा रीति-रिवाजों को संरक्षित रखने के लिए उड़ीसा के लोगों ने अनूठी विधि ईजाद की है। यह जानकारी एक स्तूप पर लगे शिलालेखों से मिली। खांडोली पत्थर पर बने इस शिलापत्र पर भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाएं चित्रित हैं। यहां पत्थरों व पक्की ईटों से बने तीन बौद्ध विहार पाए गए हैं। खुदाई के दौरान यहां मिली कलाकृतियों में सबसे महत्वपूर्ण वह है जिसमें भगवान बुद्ध का स्वर्ग से अवतरण दिखाया गया है।
उदयगिरि
रत्नगिरि से पांच और भुवनेश्वर से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद उदयगिरि कभी बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था। यहां दो बौद्ध मठ तथा एक विशाल स्तूप के अवशेष मिल चुके हैं। स्तूप के चारों कोनों पर ध्यान मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। इसमें भूमिस्पर्श, धर्मचक्र, अभय, वरद तथा ध्यान मुद्रा में भगवान बुद्ध की छवियां भी बनी हैं। यहां मिली चीजों में मिट्टी की अभिलिखित मुद्राएं अति महत्वपूर्ण हैं।
लांगुडी पर्वत
रत्नगिरि, उदयगिरि और ललितगिरि से थोड़ी ही दूरी पर मौजूद है लांगुडी हिल। केलुआ नदी के तट पर स्थित इस स्थल की दूरी भुवनेश्वर से 85 किलोमीटर है। खुदाई के दौरान यहां से सम्राट अशोक के दो चित्र प्राप्त किए गए। ध्यान रहे कि यही एक जगह है जहां अशोक के चित्र मिले हैं। पत्थरों को काट कर बनाया गया स्तूप तथा यहां से प्राप्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण कलाकृतियां भी इस बात की सबूत हैं कि किसी समय यह बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
अन्य स्थल
उड़ीसा में ऐसा एक भी जिला नहीं है, जहां बौद्ध धर्म से जुड़ी कुछ न कुछ चीजें न पाई गई हों। इन जगहों में प्राची घाटी में स्थित कुरुमा, चौरासी, जुइंती, खुर्दा जिले में बानपुर, पुरी जिले में विश्वनाथ हिल्स और अष्टरंग, कटक जिले में चौद्वार, कुरुकुल्ला व लटहारन, जाजपुर जिले में जाजपुर, सोलमपुर व खादीपाड़ा, केंद्रपारा में केंद्रपारा, बालासोर में बालासोर व अयोध्या, गंजम में जूनागढ़ व बुद्धाखोल, मयूरभंज जिले में खिछिंग, उडाला और बड़ीपदा, संभलपुर जिले में गनियापल्ली व मेल्चामुंडा, बौद्ध जिले में बाद्ध, सोनपुर जिले में सोनपुर तथा बोलांगीर जिले में बिनका आदि भी उड़ीसा में बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
जरूरी जानकारियां
निकटतम हवाई अड्डा : भुवनेश्वर
निकटतम रेलवे स्टेशन : जाजपुर-क्योंझर सड़क से भी यहां पहुंचा जा सकता है भुवनेश्र्वर से आप पूरे बौद्ध परिपथ की यात्रा ओटीडीसी बस या टैक्सी या फिर कार से कर सकते हैं।
ठहरना : ठहरने के लिए आप को पथराजपुर या भुवनेश्वर में कई अच्छे होटल मिल सकते हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय, NALANDA UNIVERSITY
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Wednesday, August 1, 2012
राजस्थान में बौद्ध धर्म के पुरातात्विक स्थल .
राजस्थान की धरती के गर्भ में बौद्ध धर्म के
जिन्दा-प्रमाण --सत्यपाल बौद्ध
‘लाभ निकेतन’ भारत नगर
वार्ड ने. 31, रतनगढ – 331022 (चूरू)
मो. 9460024587, 8107616365
एक समय था जब यह देश बहुसंख्यक बौद्धधर्मावलम्बी
देश था। सम्पूर्ण भारत वर्ष में सदिया से-सदियों तक बौद्ध धर्म की खुशबू से चहुँ
और त्रिशरण एवं पंचशील गुंजायमान हुआ करते थे। चक्रवर्ती सम्राट अशोक से लेकर
हर्षवर्धन, कनिष्क, गुप्त शासक बुद्धगुप्त व
नरसिंह गुप्त जैसे महाप्रतापों कई बौद्ध राजाओं ने भारत पर शासन किया है जिनके
वंशों का एक लम्बा इतिहास भरा पडा है। अत: कहना न होगा हमारे पुरखे बौद्ध थे।
इतिहास
का विद्यार्थी जानता है कि सम्राट अशोक ने जन कल्याण हेतु लोक हित में बौद्ध धर्म
के चौरासी हजार धम्मोपदेशों को भारत वर्ष मं चारों ओर विशाल, सांची के स्तूप सरिके चौरासी
हजार बुद्ध विहार (मंदिर, मठ, स्तूप,चैत्य) बनवाये
तथा चौरासी हजार बुद्ध विहारों में हर एक में
एक धम्मोपदेश को शिलालेख पर खुदवाकर स्थापित किया। विश्व धरोहर हैरत अंगेज कर
देनेवाले कम्बोडिया के जंगलों में फैला अंगकोरवाट के प्राचीन बुद्ध मंदिर हों
या ओसामा बिन लादेन द्वारा अफगानिस्तान
में तोडी गई बामियान के विशालकाय पहाडों को तराशकर बनाई गयी बुद्ध मूर्तियॉं। यह
बात आसानी से समझी जा सकती है कि बौद्ध धर्म कितनी दूर-दूर तक फैला हुआ था। समूचे
एशिया को आप्लावित कर बौद्ध धर्म यूरोप तक जा पहँचा। अल-बेरूनी के अनुसार इस्लाम
का उदय होने से पूर्व इराक, ईरान, अफगानिस्तान आदि देशों के लोग बौद्ध अनुयायी थे। ईसा मसीह
स्वयं कश्मीर के एक बुद्ध विहार में तेरह वर्षों तक रहे, तभी तो ईसाई धर्म में बौद्धधर्म की गहरी छाप है। बारलम और
जासाफत की कथा में बोधिस्तव का वृतान्त मिलता है। रूमानिया के प्रान्त मोलदावा
से ‘आर्यप्रज्ञापारमिता’ की पोथी के दो काले पन्ने मिले हैं। स्वीडन के
हेलगोद्वीप में कमल पर पदमासन मुद्रा में बैठे बुद्ध मूर्ति मिली हैं। इंग्लैण्ड
के सैन्ट लोग बौद्ध थे। इसी प्रकार रूस में भी बौद्ध धर्म के चिन्ह दुर्लभ नहीं
है।
तो ये थे ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक द्वारा अपने
जीवन काल में बनवाये गये चौरासी हजार बुद्ध विहार जिसे अपनी ज्ञान पिपासा शांत
करने आए दार्शनिक,चीनी यात्री
ह्रेनसांग ने स्वयं गिने, जिसके ऐतिहासिक प्रमाण
मौजूद हैं, किन्तु उसके बाद भी और छोटे-बडे बुद्ध
विहारों का बनना सदियों तक अनवरत जारी रहा। ऐसे में गांव-बस्ती में बने बुद्ध
विहारों को गिनना सम्भव हो सकता था? यह
बौद्ध काल का ही गौरवशाली इतिहास रहा है, जब विश्व धर्म
गुरू भारत को ‘सोने की चिडिया’ कहा जाता था।
खुशहाली इतनी थी कि कहते हैं यहॉं दूध-दही
की नदियॉं बहती थीं।जैसा कि मैगस्थनीज ने इंडिका में लिखा है कि स्नेह और विश्वास
इतना था कि कहते हैं लोग अपने घरों में ताले तक नहीं लगाया करते थे।
भगवान बुद्ध का
महान उपदेश ‘’अनिच्चा च संरवारा’’ अर्थात क्षण-क्षण परिवर्तनशील है। समय
परिवर्तन हुआ और विदेशी आक्रांताओं के साथ भारत के कुछेक सिर-फिरे लोगों के कुकृत्य
से इन बुद्ध विहारेां को तोडा गया तो कुछेक का स्वरूप बदल दिया गया। भयंकर
लूट-पाट हुई। शिक्षा के केन्द्र नालन्दा विश्वविद्यालय तक को आग के हवाले कर
दिया गया। त्रिपिटक और भिक्षुआं द्वारा खोज कर लिखे गये ग्रंथों को जला दिया
गया।भिक्षुओं की गर्दनें तक काट दी गयी। आम जनता में भय फैल गया। भिक्षु जान बचाकर
भारत से भागे और इस प्रकार भिक्षुओं के अभाव में ‘बौद्धधर्म’ भारतसे लुप्त प्राय: हो गया।
भारत पर कई बार
विदेशी आक्रांताओं ने हमला किया। कुछेक ने लूट-पाट की और चले गये। किन्तु-विदेशी
मुगलों ने तो यहां पांच सौ सालों तक शासन किया। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने लगभग
दो सौ सालों तक शासन किया। अंग्रेजों का नजरिया औरों से भिन्न था। अंग्रेज
ऐतिहासिक महत्व की धरोहर को ज्यादा ही महत्व देते थे। ब्रिटिशकाल में ही हडप्पा
और मोहनजोदडों से भारत की प्राचीन सभ्यता पहली बार दुनिया के सामने आयी। एक
अंग्रेज टीफन्थर ने ही सर्वप्रथम सारनाथ (वाराणसी) में सम्राट अशोक द्वारा बनवाये
गये बुद्धविहार से ‘सिंह-स्तम्भ’ को खोजा। इसी सिंह-स्तम्भ
को आज अशोक स्तम्भ कहा जाता है, और उसमें बने ‘धम्म-चक्क’ को अशोक चक्र कहते हैा। यही भगवान बुद्ध का धम्म-चक्क
अथवा धर्म चक्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज में शोभायमान है। इसरों के प्रोब पर
अंकित राष्ट्र ध्वज के साथ, बौद्ध धर्म चॉंद
पर जा पहुँचा है।
इस प्रकार
अंग्रेजों की अन्वेषणशील सोच की वजह से यहींसे शुरू हो जाता है पूरे भारत में
गह-जगह लूट-पाट कर जमींदोज कर दियेगये प्राचीन बुद्ध विहारों के अवशेष मिलना, जो आत तक निरन्तर जारी है। तो आइये हम जाने राजस्थान में
मिले अब तक के प्राचीन बौद्ध कालीन अवशेष कहॉं-कहॉं प्राप्त हुए है।
बैराठ
(जयपुर) राजस्थान की
राजधानी जयपुर के पास ही बैराठ है। बैराठ ही विराटनगर है। इसे भाब्रू भी कहते हैं।
प्रचीन काल में यह क्षेत्र मत्स्य प्रदेश कहलाता था। कहते हैा यहां कभी सम्राट
अशोक विपश्यना में रत् ध्यान साधना करते थे। यहॉं बीजक की पहाडियां पर सम्राट
अशोक के समय के प्राचीन बुद्ध विहार के अवशेष मिले हैं। एक शिलालेख भी प्राप्त
हुआ, जिसे भाब्रू अभिलेख कहते हैा। सम्राट अशेंक
द्वारा स्थापित भाब्रू अभिलेख बौद्ध धर्म को समझने व इस क्षेत्र में इसकी
उपस्थिति का स्पष्ट प्रमाण है। इसमें न केवल बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अपनी श्रद्धा का प्रदर्शन किया गया
हैं वरन् भिक्षु, भिक्षुणी तथा
उपासक-उपासिकाओ के अध्ययन एवं मनन के लिए कतिपय बौद्ध ग्रन्थों का उल्लेख भी करता
है। यह लेख इस प्रकार हैं- मगध के प्रियदर्शी राजा संघ का अभिवादन करके यह कामना
करते हैं कि वे स्वस्थ और निरापद रहें। हे! भदन्तगण जो कुछ
भगवान बुद्ध ने कहा है वह सब अच्छा कहा है। परन्तु हे! भदन्तगण, यदि मैं सद्धम
हो चिरस्थायी करने के लिए (बुद्ध)कह सकता हूँ तो मैं उसे कहना उचित समझता हूँ। हे! भदन्तगण ये धर्मग्रन्थ है नियसमुकस, अलियवसानि, अनगतिभ्यानि, मुनिगाथा,मोनेयसूत, उपतिस-पसिव, राहुलवाद जिसमें
भगवान बुद्ध ने ‘मिथ्याचार’के संबंध में कहा है।हे! भदन्तगण, मैा इसलिए यह लेख उत्कीर्ण करवा रहा हूँ कि लोग मेरी इच्छा
जान सकें।‘’
इधर उधर चारों ओर
टूटे हुए मन्दिर के अवशेष आज भी बिखरे पडे हैा। एक सिंह स्तम्भ (अशोक स्तम्भ)
भी मिला था, जिसका शीर्ष काटा गया था। वर्तमान में यह सिंह
स्तम्भ कलकत्ता संग्रहालय मं सुरक्षित रखा गया है। बताया जाताहै यहां एक सोने
की ‘स्वर्ण-मंजूषा’भी मिली थी, जिसमें तथागत भगवानबुद्ध की पवित्र अस्थियॉं सुरक्षित रखी
हुइा थी। यह ‘स्वर्ण-मंजूषा’अब कहॉं है? कोई नहीं जानता।
साम्भर – जयपुर जिले का
गॉंव साम्भर। यहॉं खारे पानी की झील है। यहां बडे पैमाने पर नमक का उत्पादन होता
है। यहॉं आबादी क्षेत्र में एक मुस्लिम की जमीन है जिसमें पडे हुए पत्थरों को वह
अपने पुरखों की कब्र बताया करता था। एक दिन जब उसने अपनी इस जमीन के चारदीवारी
बनवाने के लिए नींव खुदवाई तो तराशे हुए पत्थरेां के टुकडे और बुद्ध प्रतिमाएं
निकली, मूर्तियॉं देख पूरे साम्भर ग्राम में कोलाहल
मच गया। साम्भर के हिन्दुओं ने इसे भगवान विष्णु का मन्दिर बताकर उस पर हिन्दुओं
का हक जताकर प्रशासन में अर्जी लगा दी। चुकि जमीन गॉंव के मध्य में और आबादी
क्षेत्र मे आती है, इसलिए इसका मूल्य
समझा जा सकता है। कहा जाता है कि हिन्दू व मुसलमानों के विवाद के चलते यह मामला
अदालत में लम्बित पडा है। इसलिए यह स्थल वैसा का वैसा ही पडा है और अवशेष बिखरे
हुए आज भी पडे हैं।
लालसोट (दौसा)) दौसा जिले का गॉंव लालसोट, यहॉं पर प्राचीन बौद्धकालीन अवशेष यत्र-तत्र बिखरे पडे
हैं। प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखना क्या सरकार का काम नहीं है?
भण्डारेज (दौसा)
गुर्जर बाहुल्य इस क्षेत्र में भण्डारेज गॉंव की पहाडियों पर भी प्राचीन
अवशेष बिखरे पडे हैं।
रेढ (टॉक) यह ओंक जिले में
स्थित है। यहॉं इतिहास पुरातत्व से जुडी बहुत सी सामग्री प्राप्त हुई है। इसी
सामग्री में बौद्ध धर्म से जुडी कई प्रकार की सामग्री यहॉं प्राप्त हुई है। यहॉं
स्वर्ण, रजत एवं मिट्टी की ‘पंचमार्क’ मुद्रायें जो
बौद्ध काल में प्रचलित थी प्राप्त हुई हा। कुछ भिक्षुआं के वेश में प्राप्त
मूर्तियों के टुकडे मिले हैं। जिससे भी अनुमान लगता हैं यहॉं बौद्ध धर्म किसी समय
अवस्थित था।
झालावाड की गुफायें विश्व
प्रसिद्ध पर्यटन केंद्र अजन्ता, एलोरा व कन्हेरी
की गुफाओं की तरह यहॉं झालावाड में भी प्राचीन बौद्ध गुफाएं विद्यमान है।
पुष्कर अजमेर के पास है
पुष्कर टिला। यहॉं एक स्थान को ‘बुढा पुष्कर’ कहा जाता है। यहॉं प्राचीन बौद्धकालीन बुद्ध
विहार के अवशेष िबखरे पडे हैं। प्रसिद्ध सांची-स्तूप (भोपाल) के प्रवेश द्वारा
पर उकेरे गये अक्षरों से ज्ञात हुआ कि बुद्ध पुष्कर से चार बौद्ध भिक्षुओं व एक
भिक्षुणी ने सांची स्तूप के निर्माण में
सहायतार्थ धन राशि दी व श्रम दान भी किया था। नि:सन्देह बुढा पुष्कर ही ‘बुद्ध पुष्कर’ का अपभ्रंश है।
चित्तौडगढ प्रसिद्ध चित्तौडगढ
का किला यहॉं पर भी प्राचीन बौद्धकालीन अवशेष बिखरे पडे हैं। इस स्थान पर बापा
रावल ने 7वीं ई. में गुहिल राजवंश की नींव रखी थी। यह नींव मौर्य शासकों को पराजित
कर रखी गयी थी। चित्तौड के किले की नींव भी चित्रांग मौर्य नामक शासक ने रखी थी
उसी का विस्तार बापा ने करवाया था तो निश्चित रूप से यहॉं भी बौद्ध धर्म उन्नत
अवस्था में था, क्योंकि मौर्यों का राज धर्म बौद्ध था। अत:
प्रजा पर भी इसका असर पडना स्वाभाविक था, हो सकता है कि
आगे चलकर बौद्ध धर्म के सम्बन्धित स्मारकों स्थानों का रूप परिवर्तन कर दिया
गया हो। इतिहासकार कर्नल जेम्सटॉड ने चित्तौड से एक शिलालेख प्राप्त किया था।
उसे मानमोरी शिलालेख कहा जाता है। यह लेख 712 इा. का था परंतु टॉड ने इंग्लैण्ड
जाते समय इसे अनावश्यक समझते हुए समुद्र में फेंक दिया था। इस पर मौर्य शासकों व
बौद्ध धर्म का उल्लेख था परंतु आज इस विषय मं कुछ भी तथ्यात्मक रूप से नहीं कहा
जा सकताहै। यहॉं पर यदि पुरात्तत्व विभाग सर्वे करवाये तो आश्चर्यजनक तथ्य
उजागर होने की सम्भावना है।
भीनमाल (जालौर) यह जालौर जिले
में स्थितहै। यहॉं चीनी बौद्ध विद्वान ह्रनसांग हर्षवर्धन के काल में यहॉं आये थे
तो अवश्य ही इस स्थान पर भी बौद्ध धर्म से सम्बन्धित दर्शनीय स्थल रहा होगा
जिसे देखने वह यहॉं कंधार के रास्ते से आये थे। भीनमाल का वर्णन ह्रेनसांग द्वारा
लिखित सीयूकी (मेरा भारत वृतांत) में मिलता है। अत: यहॉं पर यदि सर्वे करवाया जाए
तो निश्चित रूप से इतिहास व पुरातत्व के लिए अति महत्वपूर्ण प्राचीन बौद्धकालीन
अवशेष मिल सकते है।
मण्डोर
(जोधपुर) सरीलंका
(श्रीलंका) के बौद्ध भिक्षु नन्दवर्धन बोधि ने जब मण्डोर का किला प्रथम
बार देखा तो वे भावुक हो गये। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने दावे से
कहा यह कोई किला नहीं था। यह तो चक्रवर्ती सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गये चौरासी
हजार बुद्ध विहारेां में से एक है। आज भी विशालकाय बुद्ध विहार के टूटे पत्थरों
पर बौद्धकालीन कला-संस्कृति स्पष्ट देखी जा सकती है। यही नहीं सबसे ऊँचे खण्डर
के पत्थरों पर भगवान बुद्ध की मूर्तियॉं उकेरी हुई आज भी विद्यमान है। पता नहीं
क्यों इस मण्डोर बुद्ध मूर्तियों एवं अन्य सामान की सूची रजिस्टर में दर्ज गौराऊ
निवासी श्री भागूराम डोडवाडिया जाट के पास रखी हुई हैा
खाटू नागौर जिले के
डेंगाना के पास ग्राम खाटू है। यहॉं की पहाडियों में बौद्धकालीन अवशेष आज भी बिखरे
है।
गौराऊ नागौर जिले की तहसील जायल
में ग्राम गौराऊ है। यहां 1987 में केशो पुत्र भैरजी जाट के खेत से प्राचीन बुद्ध
विहार के अवशेष प्राप्त हुएहैं। यहॉं धातु की इक्कीस बुद्ध मूर्तियों के साथ
झालर, कटोरदान इत्यादि के साथ मन्दिर के ऊपर गुम्बद
(शिखर) पर लगने वाला शिखर, पूरा का पूरा
सोने का प्राप्त हुआ था तथा पत्थरकी 3,3 व 31/2 फीट की
तीन मूर्तियॉं मिली जो आज भी गॉव में
मौजूद है। इन तीनों पत्थर की मूर्तियां
को गॉंव के सहयोग से बनवाये गये नवीन बुद्ध विहार में स्थापित किया गया है। गॉंव
में मिली इन सभी बुद्ध मूर्तियों एवं अन्य सामान की सूची रजिस्टर में दर्ज गौराऊ
निवासी श्री भागूराम डोडवाडिया जाट के पास रखी हुई है।
लांडनूं नागौर जिले की
तहसील है लाडनूं जो जैन विश्व भारती के कारण भी प्रसिद्ध है। यहॉं प्राचीन काल का
बुद्ध विहार आज भी सुरक्षित है। ब्रिटिश काल में निकले इस बुद्धविहार में, लाल पत्थर की तीन बुद्ध प्रतिमायें इसी विहार मं सुरक्षित
रखी हैं। वर्तमान में मन्दिर के गर्भ गृह में बुद्ध प्रतिमा के स्थान पर संगमरमर
की बनी आधुनिक दो प्रतिमायें जैन तीर्थकर की स्थापित है। तभी तो आगन्तुक इसे
बुद्ध विहार की जगह जैन मन्दिर समझने लगे हैं।मन्दिर के बाहर बडे अक्षरों में ‘’श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, बडा लाडनूं’’ लिखा हुआ है।
स्यानण प्रसिद्ध सालासर
बालाजी मन्दिर के पास ही एक गॉंव स्यानण है। यहॉं आलू की आकृति जैसे बडे-बडे
विशालकाय पत्थर एक क ऊपर एक टिके हैं। जैसे मानो किसी ने क्रेन से रखें हों। कोई
भी व्यक्ति इसे देखकर आश्चर्य चकित हुए बिना नहीं रह सकता। इन्हीं गोल-गोल पत्थरों
के साथ ही पहाडी पर बना है एक मन्दिर जिसमें एक काली मॉं की फोटो लगी है, इसी कारण इसे काली मन्दिर कहते हैा। हकीकत में यह प्राचीन
बुद्ध विहार है। न जाने किसने कब इस मन्दिर से बुद्ध मूर्ति को तोडकर काली मॉं की
फोटो लगा दी। मन्दिर में ऊकेरी गयी बौद्धकालीन कलाकृतियॉं मन्दिर के प्राचीन
इतिहास को बयान करती है। इस मन्दिर की एक विशेषता यह भी है कि मन्दिर में यदि
मूर्ति रखी जाये तो उसका मुँह दक्षिण दिशा
में होगा और मन्दिर के ऊपर ही पहाडी पर मूर्ति के ठीक सामने लगा बोधिवृक्ष
(पीपल का पेड)इसकी दूसरी विशेषता है। पहाडी पर बने मन्दिर के पास पहाडी में
छोटी-छोटी प्राकृतिक गुफाएं हैं जिनमें टूटी मूतिर्यों के अवशेष बिखरे पडे हैं1
गुफा को उल्लुओं ने अपना बसेरा बना रखा है। विडम्बना देखें कभी शांति व अहिंसा
के पर्याय इस बुद्ध विहार में आज हिंसा होती है। काली मॉं के नाम पर निरीह पशुओं
की बली चढाई जाती हैं।
सांखू (राजगढ) चूरू जिले क राजगढ तहसील
में सांखू फोर्ट नामक ग्राम में आज से करीब वर्ष भर पूर्व एक राजपूत परिवार की
जमीन मे निर्माण कार्य चल रहा था तभी अचानक किसी भवन की ऊपरी भाग जमीन की सतह पर निकला
जब खुदाई हुई तथा इतिहास अध्ययन से जुडे लोगों ने इसका निरीक्षण किया तो इसे
बौद्ध मठ प्रतीत होता बताया गया था।
लधासर (रतनगढ) जिला चूरू की
तहसील रतनगढ के पास में है एक गॉंव लधासर। हाल में यहॉं की रोही में पर्वतसिंह के
खेत से प्राचीन बौद्धकालीन अवशेष मिले हैं।यहॉं से प्राप्त अवशेषों की तुलना हम
पत्थरों पर की गई नक्काशी के आधार पर अजन्ता व एलोरा की गुफाओं के चित्रों से
कर सकते है। इन गुफाओं की चित्रकारी व प्राप्त अवशेषों की चित्रकारी में बहुत सी
समानताऍं नजर आती है। यहां जो पत्थर क अवशेष प्राप्त हुए है वह किसी बौद्ध स्तूप
या मठ का ऊपरी तोरण द्वार था, जिसका किसी
अज्ञात कारणवश विध्वंस किया गया था। उसी के अवशेष प्राप्त हुए पत्थर इतने विशाल
है कि ये किसी दूसरे स्थान से लाकर रखे गये नहीं हो सकते। कला की तुलना हम
बौद्धकालीन स्थापत्य व चित्रकला से कर सकते है। यहां सरकार की ओर से जयपुर से
आये दो पुरातत्वविदों ने इनका निरीक्षण किया है। सरकार द्वारा मंजूरी मिलने पर
यहॉं खुदाई का कार्य शुरू किया जायेगा। निश्चय ही यहॉं ऐतिहासिक दृष्टि से अति
महत्वपूर्ण अवशेष मिलेंगे। जिससे रतनगढ को एक विशिष्ठ पहचान प्राप्त होगी परंतु
जब उत्खनन होगा तो सदैव की भांति तथ्यों को तोड मरोडकर प्रस्तुत करने का भी
प्रयास किया जायेगा ।
रतनगढ से ही प्राप्त
एक शिला (प्रस्तर खण्ड) जो वर्तमान में बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित है जिस
पर ऊकेरी गयी नृतक-गायन को देखने से बौद्धकालीन अजंता एलोरा की शिल्पकला का स्मरण
हो आता है। कुछ समय पूर्व नृतक-गायन का ऐसा ही दूसरा और खण्डित प्रस्तर खण्ड जो
लावारिस पडा मिला, जिसे नगर के
समाधि स्थल शिवालय में रखा गया है। ये दोनों ही प्रस्तर-खण्ड किसी प्राचीन
बुद्धविहार के अवशेष लगते है। दोनों प्रस्तर फलक रतनगढ में कहॉं, किस मन्दिर के है? कोई नहीं जानता।
आशा की जा सकती है ये रहस्य कभी तो उजागर हो ही जायेगा।
मेरी जानकारी के
अनुसार ये है प्रदेश की हमारी विरासत और बौद्ध धर्म के इतिहास के जिन्दा प्रमाण, वे ज्ञात, अल्पज्ञात
संरक्षण से उपेक्षित प्राचीन बौद्धकालीन अवशेष जो अब तक राजस्थान में मिले है।
किन्तु गुमनामी में, धरती के गर्भ
में दफन न जाने और कितने हैं, जो छपे हुए हैं? जिनका प्रकट होना शेष है। क्या स्यानण के
बुद्ध विहार की तरह और बुद्धविहार नहीं मिल सकते? जिनका स्वरूप भी
बदला हुआ हो। क्या राजस्थान के ये अवशेष बयां नहीं करते? कभी
यहॉं बौद्ध आबादी थी। नि:संदेह हमारे पूर्वज बौद्ध थे। वरना कया कारणहै? हमारे तीज-त्यौंहार, रीति-रिवाज, परम्पराओं एवे
जीवनशैली में बौद्ध संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। स्मरण रहे, बुद्ध की शिक्षाये प्राचीन है, प्राकृतिक सत्य, शाश्वत, सनातन है, तभी तो गौतम
बुद्ध ने घोषित किया ‘एस धम्मो सनन्तनो’ अर्थात धम्म ही सनातन है और इस प्रकार केवल ‘बुद्धधम्म’ को ही ‘सनातन-धर्म’ का गौरव प्राप्त
है। यद्यपि वर्तमान भारतीय संस्कृति में विदेशी घालमेल हो चुका है। किन्तु जिन्हें
विशुद्ध प्राचीन भारतीय श्रमण संस्कृति का ज्ञान है, वे बखुबी भारतीय जनमानस में बौद्ध संस्कारों को पहचानते
हैं।
जहॉ प्राचीन
बौद्धकाल मे कुछ भिक्षु एक स्थान पर रहकर विपश्यना में रत, ध्यान साधना में लीन रहते थे तो कई भिक्षु घुमक्कड
प्रवृत्ति के होते थे। जो धम्म के प्रचार-प्रसार में दुर्गम से दुर्गम स्थानों
में जाने से भी नहीं डरते थे। ऐसे में प्राकृतिक सौन्दर्य से अलंकृत कोई भी स्थान
जेसे नदी,झील, झरना,पहाड इत्यादि पर भिक्षुओं ने पडाव न डाला हो ,तो ही नहीं सकता। जिस स्थान पर भिक्षुगण रहते वहॉंु बुद्ध
विहार का निर्माण अवश्य करते थे। ऐसे में राजस्थान का माउंट आबू हो या झीलों की
नगरी उदयपुर, कोलायत हो या लोहार्गल, ये स्थान भिक्षुओं से छूट जाने का सवाल ही नहीं होता।
यहॉं पर यदि सर्वे हो तो निश्चित रूप से यहॉं बौद्धकालीन अवशेष प्राप्त होंगे।
भवतु सब्ब मंगल।
सत्यपाल बौद्ध
‘लाभ निकेतन’ भारत नगर
वार्ड ने. 31, रतनगढ – 331022 (चूरू)
मो. 9460024587, 8107616365
साभार टंकण:- श्री फबाद अहमद, कार्यालय सहायक,
डॉ. भदन्त आनन्द
कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केन्द्र,
महात्मा गाँधी
अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
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