Bhadravati (formerly Bhandak) is a city and a municipal council in Chandrapur district in the state of Maharashtra, India. It lies 26 km from Chandrapur city. It has a major ordnance factory and several open-cast coal mines. There are about 20 villages in thetaluka. Also there are 2000 years old Buddhist caves, popularly known as Vijasan Tekdi. It is located at Vijasan village. These caves have hosted International Buddha Dhamma conventions. Several leaders and Monks of Buddha Dhamma from all over the world represent at the convention.The Vākāṭaka Empire (Marathi: वाकाटक) was a royal Indian dynasty that originated from the Deccan in the mid-third century CE. Their state is believed to have extended from the southern edges of Malwa and Gujarat in the north to the Tungabhadra River in the south as well as from the Arabian Sea in the western to the edges of Chhattisgarh in the east. They were the most important successors of the Satavahanas in the Deccan and contemporaneous with the Guptas in northern India. The Vākāṭakas, like many coeval dynasties of the Deccan, claimed Buddhist origin. Little is known about Vindhyaśakti (C. 250–270 CE), the founder of the family. Territorial expansion began in the reign of his son Pravarasena I. It is generally believed that the Vākāṭaka dynasty was divided into four branches after Pravarsena I. Two branches are known and two are unknown. The known branches are the Pravarpura-Nandivardhana branch and the Vatsagulma branch. The Gupta emperor Chandragupta II married his daughter into Vakataka royal family and with their support annexed Gujarat from the Saka Satraps in fourth century CE. The Vakataka power was followed by that of the Chalukyas of Badami in Deccan. The Vakatakas are noted for having been patrons of the arts, architecture and literature. They led public works and their monuments are a visible legacy. The rock-cut Buddhist viharas and chaityas of Ajanta Caves (a UNESCO World Heritage Site) were built under the patronage of Vakataka Emperor Harishena.
Tuesday, December 9, 2014
Bhadravati Vijjasan Buddhist Caves, Chandrapur
Tuesday, December 2, 2014
तो इसलिए विदेश दौरों पर गए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
तो इसलिए विदेश दौरों पर गए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी: रवीश
कुमार की कलम से...
नई दिल्ली: "मैं पिछले दिनों दुनिया के कई देशों में गया। जहां भी गया, मेरे दिल में हिन्दुस्तान का गरीब गांव-किसान था। मैं ऑस्ट्रेलिया गया। कहां गया...?" भीड़ से जवाब आता है, ऑस्ट्रेलिया। प्रधानमंत्री मोदी भी कहते हैं, "मैं ऑस्ट्रेलिया गया। वहां की यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से मिला। किस काम के लिए मिला। मैंने कहा कि हमारे किसान खेती करते हैं, मूंग, अरहर और चने की खेती करते हैं, लेकिन एक एकड़ भूमि में जितनी पैदावार होनी चाहिए, उतनी नहीं होती। भूमि तो बढ़ नहीं सकती, लेकिन उतनी ही भूमि में परिवार चलाना है, तो प्रति एकड़ हमारा उत्पादन कैसे बढ़े। हमने वहां के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर उस काम को आगे बढ़ाने का तय किया है, जिसके कारण मेरे भारत के छोटे किसान, गरीब किसान कम ज़मीन हो, तो भी ज्यादा उत्पादन कर सकें, ताकि उनके परिवार को दुख की नौबत न आए। यह काम मैंने ऑस्ट्रेलिया जाकर किया है।" झारखंड के डाल्टनगंज में तो क्या, देश के किसी भी हिस्से में शायद ही कोई प्रधानमंत्री या नेता ऑस्ट्रेलिया और जापान के दौरे से अपने भाषण की शुरुआत करेगा। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक में मोदी के विदेश दौरों की आलोचना हो रही थी। आज के इकोनॉमिक टाइम्स में एक हिसाब छपा है कि वह पांच महीनों में 31 दिन विदेश यात्राओं पर रहे, आठ देशों की यात्राएं की। विपक्षी दल आलोचना कर रहे थे कि यह एनआरआई प्रधानमंत्री हैं। सोशल मीडिया पर चुटकियां ली जा रही थीं कि विदेशों में भी पीएमओ का एक्सटेंशन काउंटर खुल जाएगा।
इन आलोचनाओं में मोदी को घूमने-फिरने वाले प्रधानमंत्री के रूप में
पेश किया गया। मोदी ने भी कोई काम छिपकर नहीं किया। समुंदर के किनारे फोटो खींचते
हुए तस्वीर खिंचवाई और सोशल मीडिया पर बांट दिया, जैसे तस्वीर खींचने के लिए उनके पास बहुत वक्त रहा
हो। म्यांमार पहुंचकर इंस्टाग्राम पर तस्वीर भेज दिया। कुछ लोग बहुभाषी होते हैं,
नरेंद्र मोदी बहुमाध्यमा हैं। गुजराती, हिन्दी
और अंग्रेजी के लिहाज से वह भी बहुभाषी हैं, लेकिन माध्यमों
का जिस तरह से इस्तेमाल करते हैं, कोई और नहीं कर रहा है।
प्रधानमंत्री हर वक्त संवाद के नए-नए माध्यमों की तलाश में रहते हैं। इतने तरीके
से संवाद करते हैं कि संवाद का अध्ययन करने वालों के लिए चुनौती बन जाते हैं। एक
दिलचस्प चुनौती, जिसका लगातार अध्ययन किया जा सकता है। यह
सही है कि उनकी बोली हुई बातों का काम के अनुपात में परीक्षण किया जाना बाकी है,
बल्कि हो भी रहा है, लेकिन इन आलोचनाओं से भी
मोदी अपने तरीके से लड़ते हैं। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि विदेश यात्राओं को
लेकर हो रही आलोचनाओं को वह जनता के बीच किसी खूबी में बदल देंगे। अपनी इन्हीं
त्वरित चालाकियों से वह विरोधियों को लगातार छकाते जा रहे हैं। मुझे मालूम नहीं कि
उनके दौरों पर लिखने वालों ने अपने संपादकीय लेखों में यह लिखा भी है या नहीं कि
प्रधानमंत्री ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी में प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाने की बात
करने गए थे, केले में विटामिन की क्षमता बढ़ाने पर विचार
करने गए थे। हो सकता है, लिखा भी हो और विदेश मंत्रालय के
प्रवक्ता अकबरुद्दीन साहब ने ट्वीट भी किया हो। अकबरुद्दीन बेहद काबिल प्रवक्ता
हैं, लेकिन झारखंड की गरीब जनता के बीच वह बता आए कि उनका
विदेश दौरा दरसअल कूटनीति के नफीस विद्वानों के लिए नहीं, आप
गरीब लोगों के लिए था। "हमारे देश में केले का उत्पादन
होता है। केला एक ऐसा फल है, जो गरीब भी कभी-कभी खा सकता है,
लेकिन वैज्ञानिक तरीके से उनके अंदर ज्यादा विटामिन कैसे आएं,
ज़्यादा लौह तत्व आएं, ताकि केला माताएं-बहनें
खाएं तो प्रसूति के समय जो बच्चा पैदा हो, वह ताकतवर पैदा
हो। हमारे बच्चे केला खाएं तो उनकी आंखों में जो कमी आ जाती है, छोटी आयु में आंखों की ताकत कम हो जाती है, अगर केले
में विटामिन ए ज़्यादा हो तो हमारे बच्चों को विटामिन ए मिल जाए, लोहा भी मिल जाए, यह रिसर्च करने का काम ऑस्ट्रेलिया
की यूनिवर्सिटी के साथ आगे बढ़ाने का फैसला किया है। यह काम गरीबों के लिए किया
है।" किसी विदेश दौरे का ऐसा गरीबीकरण या देसीकरण मैंने पहले नहीं देखा। हो
सकता है कि पहले के प्रधानमंत्रियों ने ऐसा किया हो, लेकिन
अपनी स्मृति में यह काम पहली बार होते हुए देख रहा हूं। कोई प्रधानमंत्री केला में
विटामिन ए और लौह तत्व बढ़ाने की बात कर रहा है। वह मतदाता के सामने अचानक डॉक्टर
से लेकर वैज्ञानिक तक सब बन जाता है। अब ऐसी स्थिति में जनता उनकी बातों पर यकीन
नहीं करेगी तो क्या करेगी, इसीलिए मैं लगातार एक साल से कह
रहा हूं कि नरेंद्र मोदी का विकल्प वही नेता बनेगा, जो उनके
हर भाषण को सुनेगा, चुनौती देने की काट निकालेगा।
नीतीश कुमार ने एक रोचक प्रयोग किया है। वह अपने कार्यकर्ताओं के बीच
मोदी के पहले और बाद के भाषणों को सुनाते हैं और फिर अपनी टिप्पणी करते हैं।
राष्ट्रीय मीडिया ने नीतीश के इस प्रयोग को नज़रअंदाज़ कर दिया है, लेकिन मोदी को पकड़ने का यह तरीका
दिलचस्प है। कम से कम संवाद और संप्रेषण के विद्यार्थियों को देखना चाहिए कि
नरेंद्र मोदी अपने संवाद कौशल से विरोधियों के संवाद कौशल को किस तरीके से बदल रहे
हैं। तभी मैंने कहा कि वह कम्युनिकेशन के विद्यार्थियों के लिए चुनौती हैं। कितनी
चतुराई से उन्होंने अपनी जापान यात्रा को आदिवासियों के कल्याण से जोड़ दिया। 31
अगस्त को टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने 'सिकल सेल एनीमिया' की बीमारी
को लेकर शिन्या यामानाका से मुलाकात की। शिन्या यामानाका को स्टेम सेल में शोध के
लिए वर्ष 2012 का नोबेल प्राइज़ मिला था। यह बीमारी भारत के
आदिवासी इलाकों में पाई जाती है। नरेंद्र मोदी ने अपनी उस मुलाकात को झारखंड की
जनता के बीच इस तरह पेश किया कि उनका विदेश दौरों पर जाना कितना ज़रूरी है। वह उस
मुलाकात को एक किस्से में बदल देते हैं। कहने लगते हैं कि मैं जापान में नोबेल प्राइज़
वैज्ञानिक से मिलने गया। मैंने कहा कि मेरे हिन्दुस्तान में जो मेरे आदिवासी भाई
बहन हैं, वह सदियों से पारिवारिक बीमारी के शिकार हैं। अगर
मां-बाप को बीमारी है तो बच्चों को बीमारी हो जाती है और आज दुनिया में इसकी कोई
दवाई नहीं है, तो आप इस दिशा में शोध का काम कीजिए, भारत खर्चा करने के लिए तैयार है, जिसके कारण मेरे
आदिवासी परिवारों को इस बीमारी से मुक्त किया जा सके। मोदी विरोधियों के लिए
मुद्दा हैं, लेकिन मोदी के लिए उनके विरोधी मुद्दा नहीं हैं।
वह जनता से संवाद करते हैं। मीडिया के सवाल-जवाब का सामना नहीं करते, लेकिन अपनी हर बात को किसी किस्से में बदलकर जनता को नई बात दे जाते हैं। डाल्टनगंज
की रैली से लौटती भीड़ यह भूल चुकी होगी कि महंगाई से लेकर काले धन पर
प्रधानमंत्री ने तो कुछ बोला नहीं, वह यही बात कर रही होगी
कि प्रधानमंत्री को यह भी पता है कि केले में कौन-सा विटामिन है, लोहा कैसे बढ़ाया जा सकता है, वह हमारे बच्चों के
स्वास्थ्य की बात करते हैं, आदिवासियों की बीमारी ठीक कर
देने की बात करते हैं। अब आप करते रहिए उनके विदेश दौरे की आलोचना। रणनीतिक
समझौतों की बारीकियों पर सेमिनार करते रहिए, वह डाल्टनगंज की
जनता को बता आए कि केला और ख़ानदानी बीमारी की दवा ढूंढने के लिए विदेश-विदेश घूम
रहे थे। प्रधानमंत्री उस बाबा की तरह बन जाते हैं जो सारी चिन्ताओं को दूर कर सकता
है। बाबा ही नहीं, एक वैज्ञानिक भी बन जाते हैं, जो किसी लैब में विटामिन से लेकर आयरन तक पर रिसर्च करवा रहा है। जब भी
लगता है कि प्रधानमंत्री के भाषण में दोहरापन आने लगा है, मोदी
खुद को बदल देते हैं। वह कुछ नया बोलने लग जाते हैं। इन बातों की सच्चाई से लेकर
दावों का राजनीतिक विश्लेषण हो सकता है, तथ्यात्मक गलतियों
को लेकर बहस भी हो सकती है, लेकिन संवाद करने की ऐसी चतुराई
और आत्मविश्वास किसी नेता के पास नहीं है। यह लेख लिखते हुए पीछे टीवी पर मोदी के
बाद जम्मू-कश्मीर के बांदीपुर से सोनिया गांधी के भाषण का प्रसारण होने लगा। ऐसा
लगता है कि उनके पास कुछ नया नहीं है। उनके पास कोई किस्सा नहीं है। कोई सपना नहीं
है। कम से कम कश्मीर के सेब में किसी नए विटामिन को बढ़ाने के संकल्प का सपना तो
दिखा ही सकती थीं। सोनिया ने भी कहा कि रिसर्च संस्थाओं को बेहतर बनाएंगे, लेकिन उसे किस्से में नहीं बदल पाईं। धार पैदा नहीं कर सकीं। दरअसल हमारी
राजनीति में संवाद कौशल से ही अब कोई नई चुनौती पैदा होगी। जो मोदी के भाषणों का
ही नहीं, उनके किए जाने वाले काम का कोई ठोस विकल्प पेश कर
सके। कोई अलग सपना पेश करना होगा। अलग तरीके से बोलना होगा।
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Wednesday, November 5, 2014
प्रो. जी. गोपीनाथन जी हमारे डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र के संस्थापक कुलपति
मित्रों, आजकल हमारे विश्वविद्यालय के अनुवाद विभाग में एक संगोष्ठी चल रही है. उसी संगोष्ठी में हमारे महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के दूसरे भूतपूर्व कुलपति आदरणीय प्रो. जी. गोपीनाथन जी भी आये हुये थे. आदरणीय प्रो. जी. गोपीनाथन जी हमारे डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र के संस्थापक कुलपति भी रहे हैं, उनके ही प्रयासों से वर्धा में यह बौद्ध अध्ययन केंद्र स्थापित हो पाया. इसी बीच मैंने कुछ समय उनसे लेकर बातचीत की कि वह वर्धा में भदंत आनंद कौसल्यायन जी की कर्म भूमि पर किस तरह से बौद्ध अध्ययन केंद्र को स्थापित कर पाये, कैसे वह बौद्ध धर्म और भगवान बुद्ध की तरफ आकर्षित हुए, किस तरह वे डॉ. एम.एल.कासारे को केंद्र का संस्थापक कार्यकारी निदेशक बनाये.? और भी बहुत सारी बातें हुईं. अंत में मैं उनको केंद्र के बारे में नवीनतम जानकारी और चल रहे समस्त पाठ्यक्रमों से से अवगत कराया, केंद्र का भ्रमण कराया, उनको संगायन जर्नल भेंट की. उनसे हुई पूरी बातचीत को कैमरे में कैद किया हमारे वरिष्ठ शोधार्थी श्री कपिल गौतमराव मून जी ने. उसको बिना काट-छांट के मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ.
Sunday, October 12, 2014
मलाला युसुफजई के बहाने
मलाला के बहाने गुमनामी में काम कर रहीं और दमन व शोषण का शिकार हुयी महिलाओं की बात.
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डॉ. सुरजीत कुमार सिंह
प्रभारी निदेशक
डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र,
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,
वर्धा.
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मित्रों, मैंने १० अक्टूबर, २०१४ को मलाला युसुफजई को नोबुल पुरस्कार मिलने के विरोध में क्या लिखा कि मेरे कुछ मित्र व शुभचिंतक मेरे पीछे पड़ गये हैं. (जिनमें फर्जीवाड़ा करने वाले फेमनिस्ट और सो-काल्ड कम्युनिस्ट पुरुष व महिलायें दोनों शामिल हैं, साथ ही अल्प एवं ना पढ़ने-लिखने वाले, पढ़ाई-लिखाई व फेम्निज्म का दिखवा करने वाले) वे मुझ पर मेरे मैसेज बाक्स में आकर ऐसा-ऐसा लिख रहें हैं कि मैं एक बच्ची का विरोध कर रहा हूँ और न जाने क्या-क्या अनाप-सनाप.?
ऐसे मौके पर मुझे यह कहना है कि सबसे पहली बात कि मैं मलाला का विरोध नहीं कर रहा हूँ. बल्कि मैं यह जानता हूँ कि उससे अधिक पूरे जीवन भर काम करने वाली महिलायें हमारे बीच मौजूद हैं और जिन्दा हैं. मैं पूछना चाहता हूँ कि मलाला ने ऐसा कौन सा काम किया है.? सिवाय B.B.C. और अन्य पश्चिमी देशों के लिए फर्जी नाम से खबरें लिखने के अलावा.? एक दिन स्कूल जाते समय तालिबानों ने गोली मार दी तो वह बच्चियों और महिलाओं की शिक्षा के लिए लड़ना हो गया.? ऐसे तो हमारे पूरे भारतीय उपमहादीप में स्कूल में और गाँव-मोहल्ले से रोज स्कूल जाते बच्चे गायब होते हैं, पढ़ाई के लिए खूब संघर्ष करते हैं, खूब पिटाई खाते हैं-स्कूल में मास्टर की और घर में माँ-बाप की. मेहनत मजदूरी करते हैं. ऐसी हज़ारों कहानियाँ हमारे बीच मौजूद हैं. किसी ने मलाल के बारे में बोला और कहा आपने हू..ले..ले.. की तरह मान लिया. मैं जानकारी दे दूं की नोबुल पुरस्कार ऐसे ही अपने आप घर बैठे नहीं मिलता है, उसके लिए नामिनेशन करवाना पड़ता है किसी दूसरे के द्वारा और खूब लाबिंग भी करनी पड़ती है! मलाला के भक्तगणों यह रहा लिंक: http://www.nobelprize.org/nomination/. इस बार की कहानी यह है.: Nominations for the 2014 Nobel Peace Prize:-The Norwegian Nobel Committee has received 278 candidates for the Nobel Peace Prize for 2014. 47 of these are organizations. 278 is the highest number of candidates ever. The previous record was 259 from 2013.
आज भारत में अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत इन आदिवासी महिलाओं के बारे में विचार कीजिये तब शायद आपकी अंतरात्मा कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाए, कि यह महिलाएं मलाला की बाप और नानी-अम्मा हैं, काम और संघर्ष के मामले में. असम राइफल्स के दफ्तर के सामने नग्न हो कर प्रदर्शन करतीं उन आदिवासी महिलाओं का समूह याद है आपको.? मणिपुर की इरोम शर्मिला का दशकों से चला आ रहा अनशन याद है आपको.? छत्तीसगढ़ की आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी की कहानी पता है.? जिसके गुप्तांग में वहाँ की पुलिस ने पत्थर भर दिये थे और जेल मैं डाल दिया था, जब डॉक्टरों ने उसका चेकअप किया तो वह भी इस अमानवीयता पर शर्मसार हो गए थे और उन्होंने उसके गुप्तांग से निकाले वे पत्थर माननीय सुप्रीम कोर्ट को लिफाफे में बंद करके भेज दिये थे. असम की सड़कों पर मारपीट कर, कपड़े फाड़कर नंगी करके दौड़ाई जाती वह आदिवासी लड़की याद है आपको.? झारखंड की दयामणि बारला याद हैं आपको? कि जब वह बोलती हैं और सड़क पर लोगों नेत्तृव करतीं हैं तो भारत के बड़े से बड़े औद्योगिक घराने कांपने लगते हैं और भारत की सरकार भी उनके सामने पानी मांगने लगती है.? उ.प्र. के बुन्देलखण्ड की पिछड़ी जाति के गड़रिया समुदाय की संपत पाल याद हैं आपको.? जो गुलाबी गैंग को नेत्तृत्व दे रहीं हैं और उनके सामने बड़े से बड़ा नेता व गुंडा चूहा बना नज़र आता है.






मित्रों, हमारे देश और दुनिया में हजारों ऐसी महिलाएं हैं जो बिना किस नाम और पुरस्कार के लालच के चुपचाप काम कर रहीं हैं. उनको नोबुल क्या है, यह पता ही नहीं है.? वे मलाला और उसके पिता की तरह फर्राटेदार ब्रिटिश स्टाइल में अंग्रेजी नहीं बोलतीं. उनको नोबुल पुरस्कार के लिए नामिनेट करने वाला कौन होगा...?सोचिए..? मैं मलाला और सम्पूर्ण नोबुल समिति निर्णायकों का पुरजोर विरोध व निषेध करता हूँ...और करता रहूंगा.....आपके कहने व लिखने से नहीं मानूंगा...........!!!
----आपकाडॉ. सुरजीत कुमार सिंह
प्रभारी निदेशक
डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र,
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,
वर्धा.
Sunday, July 13, 2014
सीमित सरोकारों वाला लेखक संघ
सीमित सरोकारों वाला लेखक संघ-
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प्रो. विवेक कुमार, समाजशास्त्र विभाग, जे.एन.यू.
क्या पल्रेस लेखकों ने कभी कोई कहानी, कविता, नाटक चमरोटी, चेरी या अन्य किसी दलित बस्ती को केंद्र में रखकर लिखी है । लगता तो नहीं है। रचना की भौतिक स्थिति एवं उसमें रचनाकार का जीवन जीना रचना की गुणवत्ता पर असर डालता है। परंतु यह घटित होना अभी बाकी है। अगर ऐसा होता तो पल्रेस इसका ढिंढोरा अवश्य पीटता।
प्रलेस की 75 वीं वषर्गांठ अपने आप में भारतीय साहित्य विशेषकर हिन्दी पट्टी के साहित्य के लिए एक टिप्पणी है। यह इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि भारतीय साहित्य कहीं न कहीं रूढ़िवादी या यथास्थितिवादी मूल्यों, मान्यताओं आदि में अवश्य फंसा रहा होगा वरना एक समूह क्यों प्रगतिशीलता का दावा करता। वह भी नौ सौ साल बाद अगर हम हिन्दी साहित्य के आदिकाल को हिंदी साहित्य का आरंभ माने। पल्रेस की निरंतरता यह भी संदेश देती है कि अब भी संघर्ष जारी है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भारतीय साहित्य में प्रगतिशील एवं रूढ़िवादी लेखन की दो समानान्तर शाखाएं हैं। ऐसा नहीं है कि एक के आने से दूसरे का अंत हो गया। दुख का विषय यह है कि 75 वर्ष के पश्चात जब हम इस आंदोलन का तटस्थ होकर आकलन करते हैं तो यह क्षीण होता दिखाई दे रहा है। इसका प्रमाण हाल ही में लखनऊ में पल्रेस की हीरक जयंती सम्मेलन में मिला। इस सम्मेलन में पल्रेस के बड़े कद वाले लेखक-आलोचक भारतीय संविधान में प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था पर ही प्रश्न उठाने लगे। कुछ साहित्यकारों ने इसे जातिवादी टिप्पणी कहा है। ऐसा नहीं है कि इस आलोचक ने ऐसा पहली बार किया है। दूसरी परम्परा की खोज में अपने गुरु जी की व्यावसायिक अस्मिता पर उनकी वर्णीय अस्मिता ‘पंडित जी’ एवं ‘द्विवेदी जी’ का जामा पहना कर पहली परम्परा को और भी मजबूत किया। अत: हमें यह पड़ताल करनी होगी कि पल्रेस की आड़ में कितने लेखकों ने प्रगतिवादी लेखन को कितना नुकसान पहुंचाया होगा। उन्होंने रूढ़ियों तथा यथास्थितिवाद के कहीं और मजबूत तो नहीं किया? दलित साहित्य ज्यादा क्रांतिकारी पल्रेस के लेखकों ने अपनी वर्गीय विचारधारा के आधार पर भारतीय या विशेषकर हिन्दू मूल्यों को चुनौती अवश्य दी होगी। परंतु आज जब हम दलित साहित्य का आकलन करते हैं तो उनकी रचनाएं पल्रेस लेखकों की रचनाओं से ज्यादा क्रांतिकारी दिखाई देती है। भारतीय समाज की संरचनाओं यथा-भारतीय गांव, जाति व्यवस्था, परिवार आदि का जितना यथार्थ चितण्रदलित साहित्य में पढ़ने को मिलता है, उसकी प्रगतिशील साहित्य में कमी अखरती है। दलित आत्मकथाओं ने जिस प्रकार भारतीय गांवों में दलितों की जिंदगी का चितण्रकिया है, वह पल्रेस लेखकों से कोसो आगे है। दलित समाज चमरौदी, महारवाड़ा, चेरी मादिगावाडा आदि से गांव किस प्रकार देखता है, वह प्रतिशील लेखक लिख कर भी नहीं लिख सकता था क्योंकि उसे यह सब लिखने के लिए उसे वहां पर ही पैदा होना होता या फिर वहीं पर पला और बड़ा होना होता। परंतु वर्णीय परिस्थितिक उसे यह स्वतंत्रता भी नहीं देती।
इसी कड़ी में दलित साहित्यकारों ने हिन्दू समाज में जिस तरह ‘गुरु’ की छवि एवं महिमा का विखंडन किया है, वह सराहनीय है। यह पक्ष पल्रेस में नदारद है। अपवाद हो सकते हैं। कहां गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेर..बताया जा रहा है वहीं दलित साहित्यकार अपनी स्वानुभूति के आधार पर क्रूर, कपटी, निर्दयी, जातिवादी घोषित कर रहे हैं (ओमप्रकाश वाल्मीकि-जूठन, श्योराजसिंह बेचैन-मेरा बचपन मेरे कंधों पर, तुलसीराम-मुर्दहिया आदि)। आत्मकथाएं ही नहीं अनगिनत कविताएं, नाटक, कहानियों में उपरोक्त चितण्रमिलते हैं, जिन पर शोध होना अभी बाकी है। स्वानुभूति की प्रामाणिकता का संज्ञान नहीं क्या पल्रेस लेखकों ने कभी कोई कहानी, कविता, नाटक चमरोटी, चेरी या अन्य किसी दलित बस्ती को केंद्र में रखकर लिखी है। लगता तो नहीं है। रचना की भौतिक स्थिति एवं उसमें रचनाकार का जीवन जीना रचना की गुणवत्ता पर असर डालता है। परंतु यह घटित होना अभी बाकी है। अगर ऐसा होता तो पल्रेस इसका ढिंढोरा अवश्य पीटता। जैसे कि जैसे ही दलित विमर्श का संदर्भ आता है, पल्रेस के सदस्य लेखक प्रेमचंद का डंडा निकाल कर दलित साहित्य को खारिज करने का विफल प्रयास करते हैं। दलित साहित्य की प्रामाणिकता एवं उसके सौन्दर्यशास्त्र पर प्रश्न उठाते हैं पर अपनी स्वानुभूति की प्रामणिकता का संज्ञान भी नहीं लेते। प्रगतिशील लेखकों ने अपनी वर्गीय अवधारणा के अंतर्गत कहीं न कहीं भारतीय सामाजिक संरचना , व्यक्तियों की सामाजिक भूमिका जो धर्मग्रंथों द्वारा स्थापित की गई एवं उनके द्वारा प्रस्तुत यथार्थ चितण्रतो दूर वंचित वर्ग के नायक-नायिकाओं को भी स्थापित नहीं किया। यहां फिर अपवाद हो सकते हैं। प्रगतिशीलता का दम भरने वाले लेखकों ने अम्बेडकर, फुले, नारायण गुरु, पेरियार, अथन्नकल्ली, जोगेन्द्रनाथ मण्डल, बिरसा मुंडा, सावित्री बाई फुले आदि दलितप्िाछड़े समाज के सुधारकों का कभी संज्ञान ही नहीं लिया। दलित साहित्य, धार्मिक एवं अब राजनीतिक आंदोलनों के कारण कुछ पल्रेस लेखकों एवं आलोचकों ने बाबा साहेब का संज्ञान तो लिया परंतु उनके व्यक्तित्व और अवदानों का आकलन बड़े ही संकुचित तरीके से किया। उनको दलित नेता तक सीमित कर दिया। यह रही उनकी प्रगतिशीलता। आखिर यह क्यों हुआ? देना होगा नई संकल्पनाओं को जन्म इसका उत्तर साफ है। सामाजिक संरचना में रचनाकार के आवंटित भूमिका एवं परिस्थिति उनकी रचनाओं को प्रभावित करती है। सामाजिक असमानता एवं जाति-श्रेणीबद्ध समाज में यह और भी सटीक बैठता है। ऐसी संरचना के कारण भिन्न-भिन्न सामाजिक श्रेणियों में जन्मे लोग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक आदि संस्थाओं का अलग-अलग अनुभव रखते हैं। कुछ सामाजिक समूह इन संस्थाओं से अपने आपको वंचित पाते हैं तथा कुछ इसका पूर्ण लाभ उठाते हैं। सामाजिक संरचना में वंचना तथा उससे लाभ की स्थिति सामाजिक समूहों/व्यक्तियों की चेतना का सर्जन करती है। इसी सृजित चेतना का सहारा लेकर रचनाकार अपनी रचना को आकार देता है। एक ओर वर्णीय सामाजिक चेतना की स्थिति का लाभ दूसरी ओर आयातित मार्क्सवादी वर्गीय अवधारणा दोनों ने मिलकर पल्रेस के लेखकों की सोच को ही दूसरी दिशा दे दी। भारत में लोग सीधे वगरे में नहीं जातियों में पैदा होते हैं और जातियां वगरे की निर्मिति में अपना योगदान देती है। परंतु पल्रेस ने अभी तक कोई सिद्धांत या यंत्र नहीं बनाया जो यह माप सके कि जाति वर्ग बनाने में कितना प्रतिशत योगदान करती है। अत: पल्रेस आर्थिक वंचना सवरेपरि होती है, को ही अंतिम मान बैठा परंतु भारत में वंचना को अगर समझना है तो व्यक्ति या सामाजिक समूह की सामाजिक संरचना में परिस्थिति, उसकी/उनकी वंचना की ऐतिहासिकता, वंचना के बहुआयामी पक्ष, उनकी वंचना के लिए दोषी समूह तथा धार्मिक आधार आदि सभी को सम्मिलित करना होगा ताकि एक नवीन संकल्पना जन्म ले सके।
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डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन
चेतना निर्माण ही लक्ष्य
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जयंती तुलसा डोंगरे
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आधुनिक काल में ऐसे व्यक्तित्व भारत में हुए हैं, जिन्होंने न केवल भारत में बौद्ध धम्म के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि देश-विदेश के बौद्ध समाज को भी एक मंच पर आने के लिएमार्गदर्शन दिया. वैसे ही व्यक्ति का नाम है- डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन. उनका जन्म 5 जनवरी 1905 को सुघना गांव, जिला चंडीगढ., पंजाब प्रांत में हुआ था. उनके बचपन का नाम हरिनाम दास था. उन्होंने खत्री जाति में जन्म लिया. लेकिन वे एक बौद्ध भिक्खु के रूप में जिए. वे अखिल भारतीय बौद्ध भिक्खु संघ के अध्यक्ष थे और प्रशिक्षण संस्थान नागपुर के संस्थापक अध्यक्ष थे. महास्थाविर लुनुपोकुने धम्मानंद के मार्गदर्शन में उन्होंने 1928 में श्रीलंका में बौद्ध धम्म की दीक्षा ली. डॉ. कौसल्यायन ने राष्ट्रभाषा हिन्दी को समृद्ध बनाने में योगदान दिया. इसके लिए हिन्दी विश्वविद्यालय प्रयाग ने उन्हें 'साहित्य वाचस्पति' की उपाधि से सम्मानित किया. इसी प्रकार नालंदा महाविहार की ओर से पाली और बौद्धधम्म की सेवा के लिए उन्हें 'विद्या वीरधि' की उपाधि से अलंकृत किया. वे हिन्दी के साहित्यकार भी थे. उनके हिन्दी साहित्य सम्मेलन, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति विदर्भ साहित्य सम्मेलन से घनिष्ठ संबंध रहे. वे विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन की कार्यकारिणी के सदस्य थे. वे कुशल वक्ता और हिन्दी के शैलीकार थे. उनके संस्मरण और अन्य निबंध आज भी साहित्य प्रेमियों द्वारा आदर के साथ पढे. जाते हैं. उन्होंने धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक विषयों पर 100 से अधिक किताबें लिखीं. उनमें से अधिकांश हिन्दी में हैं. अन्य किताबें अंग्रेजी, पाली सिंहली और पंजाबी में हैं. वे भगतसिंह के साथ भी रहे. डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन नागपुर विश्वविद्यालय (नागपुर विद्यापीठ) की सीनेट के सदस्य भी रहे. श्रीलंका में 1959 से 1968 तक वे हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने देश-विदेश की काफी यात्राएं की है. वे हमेशा घूमते ही रहते थे. जब वे श्रीलंका से भारत में नागपुर में दीक्षा भूमि पर कुछ समय तक रहे. बाद में वे नागपुर के समीप कामठी रोड स्थित बुद्ध भूमि में 1983 से बस गए. भारत को एक तरह से स्थायी रूप से कर्मभूमि बना लिया था. वे राहुल सांकृत्यायन से प्रभावित थे. उनके बारे में प्रसिद्ध हिन्दी लेखक कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपनी किताब 'क्षण बोले क्षण मुसकाए' को भेंट स्वरुप प्रदान करते हुए उस पर लिखा था कि, मान्य श्री कौसल्यायनजी को सादर, जिनका क्षण सदा बोलता रहा और कण मुस्कराता रहा. भदन्तजी की वाणी और कलम में बड.ी ताकत थी. वे शब्दों के धनी थे. लेकिन जीवन में उन्होंने अपनी वाणी और कलम से धन बटोरने का काम नहीं किया. जो पैसा उनके पास आता था, वे उसको दूसरों पर खर्च कर देते थे. वे कहते थे कि 'मैं तो पोस्टमैन का काम करता हूं. जो पैसा आ जाता है, उसको दूसरों में बांट देता हूं. बौद्ध भिक्खु के रूप में जीवन के अनुभवों का तत्वज्ञान उनके पास था. भदन्तजी एक अच्छे कहानीकार भी थे. बौद्ध साहित्य, इतिहास, संस्कृति से सम्बंधित लेखन के साथ कहानियां लिखने में उनकी विशेष रुचि थी. धर्म परिवर्तन उनकी एक सशक्त कहानी है. वे पंजाबी, हिंदी और उर्दू के भी विद्वान थे. डॉ. बाबासाहब आंबेडकर द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक 'द बुद्धा एंड हिज धम्मा' का हिन्दी में 'भगवान बुद्ध और उनका धर्म' नाम से अनुवाद किया. बौद्ध प्रशिक्षण संस्थान के साथ उन्होंने'राहुल बालसदन' की स्थापना की.वहां अनाथ बच्चों को उन्होंने सहारा दिया. जिसे वे आगे चलकर अच्छे नागरिक बना सकें. इस संस्था में सभी जाति, धर्म और पंथ के बच्चे थे. आज भी यह संस्था कार्यरत है. उनके योगदानों से प्रेरणा मिलती है, जो अविस्मरणीय है.
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Tuesday, July 8, 2014
Open New Session 2010-2011. 09 August,2010
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